जौनपुर

जौनपुर (Jaunpur) भारत के उत्तर प्रदेश राज्य के जौनपुर ज़िले में स्थित एक नगर है। यह ज़िले का मुख्यालय भी है।पहले इस जिले पर गुप्त वंश का आधिपत्य था। जौनपुर एक ऐतिहासिक शहर है। मध्यकालीन भारत में शर्की शासकों की राजधानी रहा जौनपुर वाराणसी से 58 किलोमीटर और प्रयागराज से 100 किलोमीटर दूर उत्तर दिशा में गोमती नदी के तट पर बसा है। मध्यकालीन भारत में जौनपुर सल्तनत (1394 और 1479 के बीच) उत्तरी भारत का एक स्वतंत्र राज्य था। वर्तमान राज्य उत्तर प्रदेश जौनपुर सल्तनत के अंतर्गत आता था, जिसपर शर्की शासक जौनपुर से शासन करते थे | अवधी यहाँ की मुख्य भाषा है।

राज्य - उत्तर प्रदेश  (भारत) 

प्रभाग - वाराणसी 

मुख्यालय - जौनपुर

क्षेत्रफल - 2,356 वर्ग  कि॰मी (910 वर्ग मील)

जनसंख्या - 4,476,072 (2011)

जनघनत्व - 1,108/वर्ग किमी (2,870/वर्ग मील)

शहरी जनसंख्या - 489,456

साक्षरता - 73.66%

लिंगानुपात- 1018

तहसीलें - बदलापुर, शाहगंज, मछलीशहर, जौनपुर, मड़ियाहूँ और केराकत

लोकसभा निर्वाचन क्षेत्र जौनपुर, मछलीशहर

 

औसत वार्षिक वर्षण 1250 मिमी

जौनपुर (Jaunpur) भारत के उत्तर प्रदेश राज्य के जौनपुर ज़िले में स्थित एक नगर है। यह ज़िले का मुख्यालय भी है।पहले इस जिले पर गुप्त वंश का आधिपत्य था। जौनपुर एक ऐतिहासिक शहर है। मध्यकालीन भारत में शर्की शासकों की राजधानी रहा जौनपुर वाराणसी से 58 किलोमीटर और प्रयागराज से 100 किलोमीटर दूर उत्तर दिशा में गोमती नदी के तट पर बसा है। मध्यकालीन भारत में जौनपुर सल्तनत (1394 और 1479 के बीच) उत्तरी भारत का एक स्वतंत्र राज्य था। वर्तमान राज्य उत्तर प्रदेश जौनपुर सल्तनत के अंतर्गत आता था, जिसपर शर्की शासक जौनपुर से शासन करते थे | अवधी यहाँ की मुख्य भाषा है।

भूगोल 

जौनपुर जिला वाराणसी प्रभाग के उत्तर-पश्चिम भाग में स्थित है। इसकी भूमिक्षेत्र 24.24°N से 26.12°N अक्षांश और 82.68°E और 83.50°E देशांतर के बीच फैली हुई है। गोमती और सई यहाँ की मुख्य नदियाँ हैं। इनके अलावा, वरुण, पिली और मयुर आदि छोटी नदिया हैं। मिट्टी मुख्य रूप से रेतीले, चिकनी बलुई हैं। जौनपुर अक्सर बाढ़ की आपदा से प्रभावित रहता है। जौनपुर जिले में खनिजों की कमी है। जिले का भौगोलिक क्षेत्रफल ‌4038 वर्गकिमी है।

इतिहास

जौनपुर के इतिहास की कोई प्रामाणिक जानकारी नहीं है परंतु अनुश्रुतियो के अनुसार जौनपुर प्राचीन समय में देवनागरी नाम का पवित्र स्थान था जो अपने शिक्षा,कला और संस्कृति के कारण प्रसिद्ध था। सर्वप्रथम इस स्थान पर कन्नौज के शासक ने आक्रमण करके इसे अपने आधीन कर इसका नाम यवनपुर रखा तत्पश्चात् इसपर तुगलक शासक फिरोज शाह तुगलक ने इसकी स्थापना 13वीं सदी में अपने चचेरे भाई मुहम्मद बिन तुगलक की याद में की थी जिसका वास्तविक नाम जौना खां था। इसी कारण इस शहर का नाम जौनपुर रखा गया। 1394 के आसपास मलिक सरवर ने जौनपुर को शर्की साम्राज्य के रूप में स्थापित किया। शर्की शासक कला प्रेमी थे। उनके काल में यहां अनेक मकबरों, मस्जिदों और मदरसों का निर्माण किया गया। यह शहर मुस्लिम संस्कृति और शिक्षा के केन्द्र के रूप में भी जाना जाता है। यहां की अनेक खूबसूरत इमारतें अपने अतीत की कहानियां कहती प्रतीत होती हैं। वर्तमान में यह शहर चमेली के तेल, तम्बाकू की पत्तियों, इमरती और स्वीटमीट के लिए लिए प्रसिद्ध है।

194 ई0 में कुतुबुद्दीन ऐबक ने मनदेव या मनदेय वर्तमान में जफराबाद पर आक्रमण कर दि‍या। तत्‍कालीन राजा उदयपाल को पराजि‍त कि‍या और दीवानजीत सिंह को सत्‍ता सौप कर बनारस की ओर चल दि‍या। 1389 ई0 में फि‍रोजशाह का पुत्र महमूदशाह गद्दी पर बैठा। उसने मलि‍क सरवर ख्‍वाजा को मंत्री बनाया और बाद में 1393 ई0 में मलि‍क उसशर्क की उपाधि‍ देकर कन्‍नौज से बि‍हार तक का क्षेत्र उसे सौप दि‍या । मलि‍क उसशर्क ने जौनपुर को राजधानी बनाया और इटावा से बंगाल तक तथा वि‍न्‍धयाचल से नेपाल तक अपना प्रभुत्‍व स्‍थापि‍त कर लि‍या। शर्की वंश के संस्‍थापक मलि‍क उसशर्क की मृत्‍यु 1398 ई0 में हो गयी। जौनपुर की गद्दी पर उसका दत्‍तक पुत्र सैयद मुबारकशाह बैठा। उसके बाद उसका छोटा भाई इब्राहि‍मशाह गद्दी पर बैठा। इब्राहि‍मशाह नि‍पुण व कुशल शासक रहा। उसने हि‍न्‍दुओं के साथ सद् भाव की नीति‍ पर कार्य कि‍या।

शर्कीकाल में जौनपुर में अनेकों भव्‍य भवनों, मस्‍जि‍दों व मकबरों का र्नि‍माण हुआ। फि‍रोजशाह ने 1393 ई0 में अटाला मस्‍जि‍द की नींव डाली थी, लेकि‍न 1408 ई0 में इब्राहि‍म शाह ने पूरा कि‍या। इब्राहि‍म शाह ने जामा मस्‍जि‍द एवं बड़ी मस्‍जि‍द का र्नि‍माण प्रारम्‍भ कराया, इसे हूसेन शाह ने पूरा कि‍या। शि‍क्षा, संस्‍क़ृति‍, संगीत, कला और साहि‍त्‍य के क्षेत्र में अपना महत्‍वपूर्ण स्‍थान रखने वाले जनपद जौनपुर में हि‍न्‍दू- मुस्‍लि‍म साम्‍प्रदायि‍क सद् भाव का जो अनूठा स्‍वरूप शर्कीकाल में वि‍द्यमान रहा है, उसकी गंध आज भी वि‍द्यमान है।

1484 ई0 से 1525 ई0 तक लोदी वंश का जौनपुर की गद्दी पर आधि‍पत्‍य रहा है। 1526 ई0 में दि‍ल्‍ली पर बाबर ने आक्रमण कर दि‍या और पानीपत के मैदान में इब्राहि‍म लोदी को परास्‍त कर मार डाला। जौनपुर पर वि‍जय पाने के लि‍ये बाबर ने अपने पुत्र हुमायू को भेजा जि‍सने जौनपुर के शासक को परास्‍त कर दि‍या। 1556 ई0 में हुमायूं की मृत्‍यु हो गयी तो 18 वर्ष की अवस्‍था में उसका पुत्र जलालुद्दीन मोहम्‍मद अकबर गद्दी पर बैठा। 1567 ई0 में जब अली कुली खॉ ने वि‍द्रोह कर दि‍या तो अकबर ने स्‍वयं चढ़ाई कि‍या और युद्ध में अली कुली खॉ मारा गया। अकबर जौनपुर आया और यहॉ काफी दि‍नो तक नि‍वास कि‍या। तत्‍पश्‍चात सरदार मुनीम खॉ को शासक बनाकर वापस चला गया। अकबर के ही शासनकाल में शाही पुल जौनपुर का र्नि‍माण हुआ।

पौराणि‍क काल के बाद वि‍द्वतजन जौनपुर को चन्‍द्रगुप्‍त वि‍क्रमादि‍त्‍य के काल से जोड़ते हुये ‘मनइच’ तक लाते है और तथ्‍य है कि‍ यहॉ बौद्ध प्रभाव रहा है। भर एवं शोइरी, गूजर, प्रति‍हार, गहरवार भी अधि‍पति‍ रहे है। यहॉ मोहम्‍मद गजनवी के हटने के बाद 11 वीं सदी मोहम्‍मद गोरी ज्ञानचन्‍द संघर्ष में गोरी द्वारा जीत एवं अरूनी में खजाना भेजाना, 1321 ई0 में गयासुद्दीन तुगलक द्वारा अपने पुत्र जफर खॉ तुगलक की जौनपुर में नि‍युक्‍ति‍ उसको वर्तमान शहर के र्नि‍माण से जोड़ती है। डेढ़ शताब्‍दी तक मुगल सल्‍तनत का अंग रहने के बाद 1722 ई0 में जौनपुर अवध के नवाब को सौपा गया। 1775 ई0 से 1788 ई0 तक यह बनारस के अधीन रहा और बाद में रेजीडेन्‍ट डेकना के साथ रहा। 1818 ई0 में जौनपुर के अधीन आजमगढ़ को भी कर दि‍या गया, लेकि‍न 1822 ई0 एवं 1830 ई0 में वि‍भाजि‍त कर अलग कर दि‍या गया।

अर्थव्यवस्था

जिले का आर्थिक विकास मुख्य रूप से कृषि पर निर्भर है। इस का मुख्य कारण जिले में भारी उद्योग का अभाव है। कई उद्योग वाराणसी-जौनपुर राजमार्ग के साथ आ रहे हैं। एक कपास मिल कारंजाकला के निकट काम कर रही है। सतहरिया में भी एम/एस राजा का मैदा मिल है। पेप्सिको इंडिया होल्डिंग्स, होव्किंस कुकर लिमिटेड, अमित ऑयल एंड वेगेताब्ल्ले, चौधराना स्टील ltd, सुर्या एल्यूमीनियम की तरह 85 औद्योगिक इकाइयों चल रहे हैं। जौनपुर ज़िला मे एक पशुपालन डेयरी की स्थापना की गयी है। जौनपुर ज़िला की जनसंख्या के तीन चौथाई कृषि पर निर्भर है।

कोतवाली

इसके अलावा जिले को 27 थानाओ में बांटा गया है।-कोतवाली, सदर, लाइन बाजार, जाफराबाद, खेतासराय, शाहगंज, सर्पताहन, केराकत, चंदवक, जलालपुर, सरायख्वाजा, गौर बादशाहपुर, बदलापुर, खुटहन, सिंगरामऊ, बक्शा, सुजानगंज, महाराजगंज, मुंगरा बादशाहपुर, पवारा, मछलीशहर, मीरगंज, सिकरारा, मडियाहूँ, रामपुर, बरसठी, नेवाधिया और सुरेरी।

तहसील

जौनपुर ज़िला मे 6 तहसील हैं - शाहगंज, बदलापुर, मछलीशहर, जौनपुर, मडियाहु और केराकत

मुख्य आकर्षण

अटाला मस्जिद - अटाला मस्जिद का निर्माण 1393 ईस्वी में फिरोजशाह तुगलक के समय में शुरू हुआ था जो 1408 में जाकर इब्राहिम शर्की के शासनकाल में पूरा हुआ। मस्जिद के तीन तोरण द्वार हैं जिनमें सुंदर सजावट की गई है। बीच का तोरण द्वार सबसे ऊंचा है और इसकी लंबाई 23 मीटर है। इसकी बनावट देखकर कोई भी शर्की स्थापत्य की उच्चस्तरीय निर्माण कला का आसानी से अंदाजा लगा सकता है।

जामा मस्जिद - जौनपुर की इस सबसे विशाल मस्जिद का निर्माण हुसैन शाह ने 1458-78 के बीच करवाया था। एक ऊंचे चबूतर पर बनी इस मस्जिद का आंगन 66 मीटर और 64.5 मीटर का है। प्रार्थना कक्ष के अंदरूनी हिस्से में एक ऊंचा और आकर्षक गुंबद बना हुआ है।।मस्जिद से लगा हुआ शरकी क़ब्रिस्तान भी आकर्षक का केंद्र है।

शाही किला - शाही किला गोमती के बाएं किनारे पर शहर के दिल में स्थित है। शाही किला फिरोजशाह ने १३६२ ई. में बनाया था इस किले के भीतरी गेट की ऊचाई २६.५ फुट और चौड़ाई १६ फुट है। केंद्रीय फाटक ३६ फुट उचा है। इसके एक शीर्ष पर वहाँ एक विशाल गुंबद है। शाही किला में कुछ आदि मेहराब रहते हैं जो अपने प्राचीन वैभव की कहानी बयान करते है।

लाल दरवाजा मस्जिद - इनगर के बेगमगंज मुहल्‍ले में स्‍थि‍त लाल दरवाजा का र्नि‍माण सन् 1450 ई0 में इब्राहि‍म शाह शर्की के पुत्र महमूद शाह शर्की की पत्‍नी बीबी राजे ने करवाया था। इमारत का मुख्‍य दरवाजा लाल पत्‍थरों से नि‍र्मि‍त है जि‍से चुनार से मंगवाया गया था। इमारत का बाहरी क्षेत्रफल 196 गुने 171 फीट के लगभग है। इसमें मध्‍य के हर तरफ महि‍लाओं के बैठने का स्‍थान है जहां सुन्‍दर बारीक झझरि‍यां कटी हुई है। इसके दो स्‍तम्‍भों पर संस्‍कृत तथा पाली भाषा में कुछ लि‍खावट उत्‍कीर्ण है, जि‍समें संवत् व कन्‍नौज राजाओं के नामाति‍रि‍क्‍त कुछ वि‍शेष अर्थ नही नि‍कलता। मस्‍जि‍द की केन्‍द्रीय मेहराब को ढाकने वाली चादर काफी सुन्‍दर है, काले पत्‍थरों पर ‘ला इलाहा इलल्‍लाहो मोहम्‍मदुर्रसूलल्‍लाह’ उभार लेकर उत्‍कीर्ण है। उपर छत पर जाने के चार रास्‍ते हैं महि‍लाओं के लि‍ए 48 X 44 फीट का पृथक रास्‍ता है। इस्‍लामी शैली पर बनायी गयी यह मस्‍जि‍द वर्तमान में ‘इस्‍लामी शि‍क्षा का उच्‍च केन्‍द्र’ के रूप में प्रति‍स्‍थापि‍त है।

खालिश मुखलिश मस्जिद - यह मस्जिद 1417 ई. में बनी थी। मस्जिद का निर्माण मलिक मुखलिश और खालिश ने करवाया था।

शाही ब्रिज - शाही पुल तारीख मुइमी के अनुसार जौनपुर के इस वि‍ख्‍यात शाही पुल का र्नि‍माण अकबर के शासनकाल में उनके आदेशानुसार सन् 1564 ई0 में मुनइन खानखाना ने करवाया था। यह भारत में अपने ढंग का अनूठा पुल है और इसकी मुख्‍य सड़क पृथ्‍वी तल पर र्नि‍मित है। पुल की चौड़ाई 26 फीट है जि‍सके दोनो तरफ 2 फीट 3 इंच चौड़ी मुंडेर है। दो ताखों के संधि‍ स्‍थल पर गुमटि‍यां र्नि‍मित है। पहले इन गुमटि‍यों में दुकाने लगा करती थी। पुल के मध्‍य में चतुर्भुजाकार चबूतरे पर एक वि‍शाल सि‍ह की मूति है जो अपने अगले दोनो पंजो पर हाथी के पीठ पर सवार है। इसके सामने मस्‍जि‍द है। पुल के उत्‍तर तरफ 10 व दक्षि‍ण तरफ 5 ताखें है, जो अष्‍ट कोणात्‍मक स्‍तम्‍भों पर थमा है।

शीतला माता मंदिर (चौकियां धाम) - शीतला माता चौकिया

शीतला चौकि‍यां देवी का मन्‍दि‍र बहुत पुराना है। शि‍व और शक्‍ति‍ की उपासना प्राचीन भारत के समय से चली आ रही है। इति‍हास के आधार पर यह कहा जाता है कि‍ हि‍न्‍दु राजाओं के काल में जौनपुर का शासन अहीर शासकों के हाथ में था। जौनपुर का पहला अहीर शासक हीरा चन्‍द्र यादव माना जाता है। ऐसा माना जाता है कि‍ चौकि‍यां देवी का मन्‍दि‍र कुल देवी के रूप में यादवों या भरो द्वारा र्नि‍मित कराया गया, परन्‍तु भरों की प्रवृत्‍ति‍ को देखते हुए चौकि‍यां मन्‍दि‍र उनके द्वारा बनवाया जाना अधि‍क युक्‍ति‍संगत प्रतीत होता है। भर अनार्य थे। अनार्यो में शक्‍ति‍ व शि‍व की पूजा होती थी। जौनपुर में भरो का आधि‍पत्‍त भी था। सर्वप्रथम चबूतरे अर्थात चौकी पर देवी की स्‍थापना की गयी होगी, संभवत- इसीलि‍ए इन्‍हे चौकि‍या देवी कहा गया। देवी शीतला आनन्‍ददायनी की प्रतीक मानी जाती है। अत: उनका नाम शीतला पड़ा। ऐति‍हासि‍क प्रमाण इस बात के गवाह है कि‍ भरों में तालाब की अधि‍क प्रवृत्‍ति‍ थी इसलि‍ए उन्‍होने शीतला चौकि‍या के पास तालाब का भी र्नि‍माण कराया।

बारिनाथ मंदिर - बाबा बारिनाथ का मंदिर इतिहासकारों के अनुसार लगभग ३०० वर्ष पुराना है। यह मंदिर उर्दू बाज़ार में स्थित है और इस दायरा कई बीघे में है। बाहर से देखने में आज यह उतना बड़ा मंदिर नहीं दीखता लेकिन प्रवेश द्वार से अन्दर जाने पे पता लगता है कि यह कितना विशाल रहा होगा।

यमदाग्नी आश्रम - जिले के जमैथा गावं में गोमती नदी के किनारे स्थित यह आश्रम एक धार्मिक केन्द्र के रूप में विख्यात है। सप्तऋषियों में से एक ऋषि जमदग्नि उनकी पत्नी रेणुका और पुत्र परशुराम के साथ यहीं रहते थे। संत परशुराम से संबंध रखने वाला यह आश्रम आसपास के क्षेत्र से लोगों को आकर्षित करता है।

रामेश्वरम महादेव - यह भगवान शिव का मंदिर राजेपुर त्रीमुहानी जो सई और गोमती के संगम पर बसा है। इसी संगम की वजह से इसका नाम त्रीमुहानी पड़ा है यह जौनपुर से 12 किलोमीटर दूर पूर्व की दिशा में सरकोनी बाजार से ३ किलोमीटर पर हैं और इस स्थान के विषय में यह भी कहा जाता है कि लंका विजय करने के बाद जब राम अयोध्या लौट रहे थे तब उस दौरान सई-गोमती संगम पे कार्तिक पुर्णिमा के दिन स्नान किया जिसका साक्ष्य वाल्मीकि रामायण में मिलता है "सई उतर गोमती नहाये , चौथे दिवस अवधपुर आये ॥ तब से कार्तिक पुर्णिमा के दिन प्रत्येक वर्ष मेला लगता है। त्रिमुहानी मेला संगम के तीनों छोर विजईपुर, उदपुर, राजेपुर पे लगता है दूर सुदूर से श्रद्धालु यहाँ स्नान ध्यान करने आते हैं। विजईपुर गाँव में अष्टावक्र मुनि की तपोस्थली भी है और इसी विजईपुर गाँव में ही 'नदिया के पार' फिल्म की शूटिंग हुई।

गोकुल घाट(गोकुल धाम) - गोकुल धाम मंदिर अत्यंत पुराना मंदिर है जिसे लगभग 400 वर्ष पुराना माना जाता है जो कि गोमती नदी के तीर स्थित है। गोकुल घाट के संरक्षक साहब लाल मौर्य के द्वारा बताया गया है कि यह मंदिर बहुत ही प्राचीन और बहुत विशाल है परन्तु अब इसका अधिक हिस्सा ग्रामीणों द्वारा कब्जा कर लिया गया है।

पांचों शिवाला - यह मंदिर जौनपुर के प्राचीन मंदिरों में से एक है इसकी प्राचीनता के विषय में किसी को कोई सटीक जानकारी नहीं है परन्तु यह अत्यंत आकर्षक शिव मंदिर है। इसमें पांच शिवालयों का समूह आकर्षक है इसके इतिहास का कहीं सटीक वर्णन नहीं मिलता।

झझरी मस्जिद - यह मस्‍जि‍द मुहल्‍ला सि‍पाह जनपद जौनपुर में गोमती के उत्‍तरी तट पर वि‍द्यमान है। इसको इब्राहि‍म शाह शर्की ने मस्‍जि‍द अटाला एवं मस्‍जि‍द खालि‍स के र्नि‍माण के समय बनवाया था क्‍योंकि‍ यह मुहल्‍ला स्‍वयं इब्राहि‍म शाह शर्की का बसाया हुआ था। यहॉ पर सेना, हाथी, घोड़े, उंट एवं खच्‍चर रहते थे। सन्‍तों पंडि‍तो का स्‍थल था। सि‍कन्‍दर लोदी ने इस मस्‍जि‍द को ध्‍वस्‍त करवा दि‍या था। सि‍कन्‍दर लोदी द्वारा ध्‍वस्‍त कि‍ये जाने के बाद यहॉ के काफी पत्‍थर शाही पुल में लगा दि‍ये गये है। यह मस्‍जि‍द पुरानी वास्‍तुकला का अत्‍यन्‍त सुन्‍दर नमूना है।

अन्य दर्शनीय स्थल

चतुर्मुखी अर्धनारीश्वर प्रतिमा इस जनपद के बक्सा थाना के अंतर्गत ग्राम चुरामनपुर में गोमती नदी से सटे एक बड़े नाले के समीप ही एक अति प्राचीन मूर्ति है ,जो कि चतुर्मुखी शिवलिंग अथवा अर्धनारीश्वर प्रतिमा प्रतीत होती है। इस मूर्ति की पहचान जनसामान्य में चम्मुख्बीर बाबा के नाम से एक ग्राम देवता के रूप में की जाती है। मूर्ति कला कि दृष्टी से यह मूर्ति अपने आप में एक बेजोड़ प्रस्तुति है एवं सामान्यतया ऐसी मूर्ति का निदर्शन उत्तर -भारत में कम है। इतिहास कारों ने प्रथमदृष्टि में इसे गुप्तकालीन कृति माना है।

उपरोक्त लोकप्रिय दर्शनीय स्थलों के अलावा भी जौनपुर में देखने के लिए बहुत कुछ है। उदारहण के लिए शाही किल, ख्वाब गाह, दरगाह चिश्ती, पान-ए-शरीफ, जहांगीरी मस्जिद, अकबरी ब्रिज और शर्की सुल्तानों के मकबरें प्रमुख हैं। सई-गोमती संगम ,संगम स्थित विजईपुर ग्राम में बने 'नदिया के पार' फिल्म का शूटिंग स्थल , संगम पे रामेश्वर मंदिर , संगम से कुछ दूर बिरमपुर केवटी में स्थित चौबीस गाँव की कुल देवी माँ चंडी धाम, शीतला चौकियाँ धाम , जमैथा आश्रम , पूर्वांचल विश्वविद्यालय , तिलकधारी महाविद्यालय , मैहर धाम, कटवार, आदि ; इन सब के अतिरिक्त हनुमानजी का एक बहुत ही प्रसिद्ध मंदिर " अजोसी महावीर धाम " मड़ियाहूं तहसील के अजोसी गांव में स्थित है , यहाँ हर मंगलवार को प्रभु के दर्शन हेतु हजारों श्रद्धालु आते हैं ,और शिवपुर में दुर्गा मां,और हनुमान जी का भव्य मन्दिर है, आप भी कभी समय निकाल कर यहाँ दर्शन हेतु अवश्य आएँ ।

यूनवर्सिटी वीर बहादुर सिंह पूर्वांचल विश्विद्यालय

आवागमन

वायु मार्ग - जौनपुर शहर का निकटतम एयरपोर्ट वाराणसी का लाल बहादुर शास्त्री एअरपोर्ट (बाबतपुर एयरपोर्ट) है, जो यहां से 35 किलोमीटर की दूरी पर है। एअरपोर्ट, राष्ट्रीय राजमार्ग संख्या ५६ पर है और यात्रा में औसतन ४५ मिनट का समय लगता है।

रेल मार्ग - जौनपुर में २ मुख्य रेलवे स्टेशन हैं, १. जौनपुर जंक्शन, २. जौनपुर सिटी स्टेशन। जौनपुर का रेलवे स्टेशन लखनऊ वाराणसी और दीन दयाल उपाध्याय रेललाइन पर पड़ता है। गंगा यमुना एक्सप्रेस, वरुणा एक्सप्रेस और श्रमजीवी एक्सप्रेस ,सद्भावना एक्सप्रेस,और गोदान एक्सप्रेस जौनपुर को अनेक शहरों से जोड़ती है।

सड़क मार्ग - जौनपुर शहर आसपास के अनेक शहरों से सड़क मार्ग से जुड़ा हुआ है। वाराणसी, इलाहाबाद, फ़ैज़ाबाद, अयोध्या,अकबरपुर लखनऊ, गोरखपुर, आजमगढ़, सुल्तानपुर ,पडरौना शहरों से जौनपुर के लिए नियमित बस सेवाएं उपलब्ध है।

विज्ञान और प्रौद्योगिकी

दुनिया का सर्वाधिक भाषाएं बोलने वाली सामाजिक और शैक्षिक ह्यूमनॉइड रोबोट "रोबोट शालू"। अपशिष्ट पदार्थ से बनी 47 भाषाएं बोलने में सक्षम विश्व प्रसिद्ध रोबोट शालू को जौनपुर के ही एक वैज्ञानिक व शिक्षक ने विकसित किया है।

विधान सभा निर्वाचन क्षेत्र

9 विधान सभा निर्वाचन क्षेत्र है। जिले को 21 विकास खंड में विभाजित किया गया है-सोंधी (शाहगंज), सुइथाकला, खुटहन, कारंजाकला, बदलापुर, महाराजगंज, सुजानगंज, बक्शा, मुंगरा बादशाहपुर, मछलीशहर, मडियाहूँ, बरसठी, रामपुर, रामनगर, जलालपुर, केराकत, डोभी, मुफ्तीगंज, धर्मापुर, सिकरारा और सिरकोनी।

जौनपुर की मूली - जौनपुर की मूली बहुत प्रसिद्ध है और यह लगभग 4 से 6 फीट तक होती है जब भी ऐसी मूली सामने आती है चर्चा का विषय बन जाती है और उसे देखने के लिए भीड़ लग जाती है । लेकिन वर्तमान में यह अपना वजूद खो रही है। इसके पीछे कई कारण हैं, जैसे मूली की खेती कुछ विशेष क्षेत्रों में होना जहां मकान बनाये जाने से, तथा मूली का उचित लागत न मिलने के कारण किसानों का मूली से मोहभंग हो गया। यही कारण है कि 15 से 17 किलो तक वजन की कुल मूली अब 5 से 7 किलो की भी मुश्किल से हो पाती है। लेकिन कभी कभी वर्तमान में भी यह चर्चा का विषय बनी रहती है।

 

Galary Image: 
royal bridge Jaunpur up india eduat10
Jaunpur Jama Masjidup india-eduat10
hajhari Mosque-Jaunpur-up india eduat10
Atala Masjid Jaunpur up india eduat10
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