मुज़फ़्फ़रनगर

क्षेत्रफल : 4008 किमी² 

जनसंख्या(2011):

• घनत्व : 2827154 

710/किमी² 

उपविभागों के नाम: तहसीलें

उपविभागों की संख्या: 4

मुख्य भाषा(एँ): हिन्दी

 

मुज़फ़्फ़रनगर भारतीय राज्य उत्तर प्रदेश का एक ज़िला है। ज़िले का मुख्यालय मुज़फ़्फ़रनगर है। जिला सहारनपुर मंडल का हिस्सा है। जिले का क्षेत्रफल 4008 किमी है। मुज़फ़्फ़रनगर, बुढ़ाना,जानसठ,खतौली यहाँ के तहसील हैं। सन् 2011 की जनगणना में इसका साक्षरता दर 68.68% था। इसका एस.टी.डी (STD) कोड 0131 है।

इतिहास

इतिहास और राजस्व प्रमाणों के अनुसार दिल्ली के बादशाह, शाहजहाँ, ने सरवट (SARVAT) नाम के परगना को अपने एक सरदार सैयद मुजफ़्फ़र खान को जागीर में दिया था जहाँ पर 1633 में उसने और उसके बाद उसके बेटे मुनव्वर लश्कर खान ने मुजफ़्फ़र नगर नाम का यह शहर बसाया।

परन्तु इस स्थान का इतिहास बहुत पुराना है। काली नदी के किनारे सदर तहसिल के मंडी नाम के गाँव में हड़प्पा कालीन सभ्यता के पुख्ता अवशेष मिले हैं। अधिक जानकारी के लिये भारतीय सर्वेक्षण विभाग वहां पर खुदाई कार्य करवा रहा है। सोने की अंगूठी जैसे आभूषण और बहुमूल्य रत्नों का मिलना यह दर्शाता है कि यह स्थान प्राचीन समय में व्यापार का केन्द्र था। तैमूर आक्रमण के समय के फारसी इतिहास में भी इस स्थान का वर्णन मिलता है। शहर से छह किलोमीटर दूर सहारनपुर रोड़ पर काली नदी के ऊपर बना बावन दरा पुल, करीब 1512 ईस्वी में शेरशह सूरी ने बनवाया था। शेरशाह सूरी उस समय मुगल सम्राट हुमायूं को पराजित कर दिल्ली की गद्दी पर बैठा था। उसने सेना के लश्कर के आने जाने के लिये सड़क का निर्माण कराया था जो बाद में ग्रांट ट्रंक रोड़ के नाम विख्यात हुई। इसी मार्ग पर बावन दर्रा पुल है। माना जाता है कि इसे इसे उस समय इस प्रकार डिजाईन किया गया था कि यदि काली नदी में भीषण बाढ़ आ जाये तो भी पानी पुल के किनारे पार न कर सके। पुल में कुल मिला कर 52 दर्रे बनाये गये हैं। जर्जर हो जाने के कारण अब इसका प्रयोग नहीं किया जा रहा है। वहलना गांव में शेरशाह सूरी की सेना के पड़ाव के लिये गढ़ी बनायी गई थी। इस गढ़ी का लखौरी ईटों का बना गेट अभी भी मौजूद है।

ग्राम गढ़ी मुझेड़ा में स्थित सैयद महमूद अली खां की मजार मुगलकाल की कारीगरी की मिसाल है। 400 साल पुरानी मजार और गांव स्थित बाय के कुआं की देखरेख पुरातत्व विभाग करता है। मुगल समा्रट औरगजेब की मौत के बाद दिल्ली की गद्दी पर जब मुगल साम्राज्य की देखरेख करने वाला कोई शासक नहंी बचा तो जानसठ के सैयद बन्धु उस समय नामचीन हस्ती माने जाते थे। उनकी मर्जी के बिना दिल्ली की गद्दी पर कोई शासक नहंी बैठ सकता था। जहांदार शाह तथा मौहम्मद शाह रंगीला को सैयद बंधुओं ने ही दिल्ली का शासक बनाया था। इन्ही सैयद बंधुओं मे से एक का नाम सैयद महमूद खां था। उन्हीं की मजार गा्रम गढ़ीमुझेड़ासादात में स्थित हैं। जिसमें मुगल करीगरी की दिखाई पड़ती है। 400 साल पुरानी उक्त सैयद महमूद अली खां की मजार तथा प्राचीन बाय के कुयेंं के सम्बन्ध में किदवदन्ती है कि दोनो का निर्माण कारीगरों द्वारा एक ही रात में किया गया था। लम्बे समय तक मुगल आधिपत्य में रहने के बाद ईस्ट इण्डिया कम्पनी ने 1826 में मुज़फ़्फ़र नगर को जिला बना दिया। 1857 के स्वतंत्रता संग्राम में शामली के मोहर सिंह और थानाभवन के सैयद-पठानों ने अंगेजों को हरा कर शामली तहसिल पर कब्जा कर लिया था परन्तु अंग्रेजों ने क्रूरता से विद्रोह का दमन कर शामली को वापिस हासिल कर लिया।

6 अप्रैल 1919 को डॉ॰ बाबू राम गर्ग, उगर सेन, केशव गुप्त आदि के नेतृत्व में इण्डियन नेशनल कांगेस का कार्यालय खोला गया और पण्डित मदन मोहन मालवीय, महात्मा गांधी, मोती लाल नेहरू, जवाहर लाल नेहरू, सरोजनी नायडू, सुभाष चन्द्र बोस आदि नेताओं ने समय-समय पर मुज़फ़्फ़र नगर का भ्रमण किया। खतौली के पण्डित सुन्दर लाल, लाला हरदयाल, शान्ति नारायण आदि बुद्धिजीवियों ने स्वतंत्रता आन्दोलन में बढ़-चढ़ कर भाग लिया। 15 अगस्त 1947 को आजादी मिलने पर केशव गुप्त के निवास पर तिरंगा फ़हराने का कार्यक्रम रखा गया। 

भूगोल

यह समुद्र तल से 237-245 मीटर ऊपर, दिल्ली से लगभग 116 किमी दूर, उत्तर प्रदेश के उत्तर में उत्तरी अक्षांश 29º 11' 30" से 29º 45' 15" तक और पूर्वी रेखांश 77º 3' 45" से 78º 7' तक स्थित है। यह राष्ट्रीय राज मार्ग 58 पर सहारनपुर मण्डल के अंतर्गत गंगा और यमुना के दोआब में, दक्षिण में मेरठ और उत्तर में सहारनपुर जिलों के बीच स्थित है। पश्चिम में शामली मुज़फ़्फ़र नगर को हरियाणा के पानीपत और करनाल से और पूर्व में गंगा नदी उत्तर प्रदेश के बिजनोर जिले से अलग करती है। मुज़फ़्फ़र नगर का क्षेत्रफल 4008 वर्ग किलोमीटर (19,63,662 एकड़) है। मुजफ़्फ़र नगर में पहली जनसंख्या 1847 में हुई और तब मुजफ़्फ़र नगर की जनसंख्या 537,594 थी। 2001 की जनसंख्या के अनुसार मुज़फ़्फ़र नगर जिले की आबादी 35,43,360 (18,93,830 पुरूष और 16,49,530 महिला, 26,39,480 ग्रामीण और 9,03,880 शहरी, 17,80,380 साक्षर, 4,78,320 अनुसूचित जाति और लगभग 90 अनुसूचित जनजाति) है और औसत 31,600 व्यक्ति प्रतिवर्ग किलोमीटर में रहते हैं। मुज़फ़्फ़र नगर जिले में 2 लोक सभा, 5 विधान सभा, 4 तहसिल, 10 खण्ड (ब्लोक), 5 नगर पालिकाएं, 20 टाऊन एरिया, 1027 गांव (2003-04 में केवल 886 गाँवों में बिजली थी), 28 पुलिस स्टेशन, 15 रेलवे स्टेशन (उत्तरी रेलवे, 1869 में रेलमार्ग आरम्भ हुआ) हैं। 2001 में 557 औघोगिक कम्पनियाँ और 30,792 स्माल स्केल कम्पनियाँ थी।

प्रमुख स्थल

पुरकाज़ी

यह एक उत्तराखंड बॉर्डर पर स्थित हे। यह स्थान सड़क जाम ओर चाट के लिए परसिद्ध हे। पुरकाज़ी को एनएच-58 दो भागों मे बाँटता हे। पुरकाज़ी मे उत्तर प्रदेश परिवहन का मेन अड्डा हे। इस के पास से गंगा नदी भी बहती हे। 

 

शुक्रताल शुक्रतीर्थ - शुक्रताल

शुक्रतीर्थ – शुक्रताल ऐसा पवित्र स्थान है जहां शुकदेव गोस्वामी ने 5000 साल पहले अभिमन्यु के पुत्र महाराज परीक्षित को पवित्र श्रीमद-भागवतम (भागवत पुराण) की कथा सुनाई थी । यह उत्तर भारत का एक प्रसिद्ध पवित्र स्थान और मुज़फ्फरनगर से लगभग २८ किलोमीटर दूर पवित्र गंगा किनारे स्थित है । हर साल बहुत से तीर्थयात्री कार्तिक पूणिमा के दिन पवित्र नदी ‘गंगा’ में स्नान करने के लिए आते हैं।

शुक्रताल के अन्य दर्शनीय स्थान:

अक्षयवट (अनन्त वृक्ष): अक्षयवट एक पहाड़ी पर बड़ा स्थित है पुराणिक कथा के अनुसार इस अक्षयवट (बरगद का पेड़) के नीचे, ऋषि शुकदेव ने श्रीमद्भगवतीत कथा को राजा परीक्षित को सुनाया था। इस पेड़ की विशिष्टता यह है कि यह पेड़ कभी अपने पत्ते नहीं छोडता है ।

शुक्देव मंदिर: इस भव्य मंदिर में खूबसूरती से नक्काशी की गई ऋषि शुकदेव और राजा परीक्ष की मूर्तियां स्थापितहै ।

भगवान हनुमान मंदिर: शुकदेव मंदिर के नजदीक में ही हनुमान जी का एक विशाल मंदिर है । इस मंदिर के ऊपर हनुमान जी की 75 फुट ऊंची मूर्ती स्थापित है।

गणेश मंदिर: हनुमान जी  के मंदिर के पास ही एक बेहद दर्शनीय गणेश मंदिर है जहाँ 35 फुट ऊँची भगवन गणेश जी की मूर्ती स्थापित है ।

इसके अतिरिक्त यहाँ भगवान शंकर मंदिर, स्वामी चरनदासजी मंदिर,चरनदासजी मंदिर, भगवान राम मंदिर, देवी शकंभरी मंदिर, नीलकंठ महादेव मंदिर, गंगा मंदिर के दर्शनीय मंदिर भी स्थापित हैं ।

अक्षय वट - तीर्थ नगरी शुक्रताल

अक्षय वट वृक्ष लगभग 5100 वर्ष पुराना चमत्कारी वृक्ष है l जिसकी शाखाएं 150 फीट की ऊंची व विशाल हैं । ऐसा मन जाता है कि इस दिव्या वृक्ष के नीचे बैठकर ऋषि सुखदेव ने 7 दिन तक अर्जुन के पोते, रजा परीक्षित तथा ऋषि मुनियों को श्रीमद भगवत पूरण की कथा सुनाई थी। इसी करना से यह वृक्ष देवत्व, सत्य, क्षमा और पवित्रता के प्रतीक के रूप में देखा जाता है। पौराणिक वट वृक्ष के बारे में मान्यता है कि पतझड़ के दौरान इसका एक भी पत्ता सूखकर जमीन पर नहीं गिरता अर्थात इसके पत्ते कभी सूखते नहीं है और इसका एक विशेष गुण यह भी है कि इस विशाल वृक्ष में कभी जटाएं उत्पन्न नहीं हुई। भक्तजन इस वृक्ष की परिक्रमा कर अपनी कामनाएं पूरी करने के लिए चारों ओर एक लाल धागा बांधते है।

वहलना

वहलना जैनों के लिए एक महत्वपूर्ण तीर्थ स्थल है। इस साइट में एक मस्जिद, एक शिव मंदिर और जैन मंदिर एक समान दीवार साझा करते हैं, जो धर्मनिरपेक्षता को दर्शाते हैं। बहलना जैन मंदिर, जिसे श्री 1008 पार्श्वनाथ दिगंबर जैन अतिशयक्षेत्र के नाम से भी जाना जाता है, में भगवान पार्वनाथ के एक पुराने मूर्ति है। इस मंदिर परिसर में भी 57 फीट की ऊंचाई वाली मनस्थम और एक नैचुरोपैथी अस्पताल और रिसर्च सेंटर है। जैन मंदिर में  पार्श्वनाथ जी की नव निर्मित 31 फीट मोनोलिथ प्रतिमा स्थापित की गई है। बहलना मुज़फ्फरनगर शहर से 4 किमी दूर स्थित एक छोटा सा औद्योगिक गांव है।

शुक्रताल गंगा स्नान

दिल्ली से, यह महत्वपूर्ण पवित्र स्थान दिल्ली और हरिद्वार के बीच लगभग दो तिहाई मार्ग पर स्थित है। यह छोटा सा शहर पवित्र गंगा नदी की एक शाखा के किनारे पर बसा है। इस पवित्र स्थान पर शुकदेव जी महाराज ने अक्षय वट के नीचे बैठकर लगभग 5000 साल पहले महाराज परीक्षित को श्रीमद भागवत की कथा सुनाई थी । यहाँ पर मुज़फ्फरनगर शहर से एक घंटे में पहुंचा जा सकता है। यह दिल्ली से लगभग 150 किमी दूर है।

शुकतीर्थ – भागवत पीठ शुक्देव आश्रम 5100 वर्ष पुराने अक्षय वट वृक्ष के पेड़ के आसपास बनाया गया है । जो पहाड़ी की चोटी पर बैठता है । शुक देव गोस्वामी जी ने अक्षय वट के नीचे बैठकर 5000 साल पहले महाराजा परीक्षित तथा 80,000 ऋषियों को श्रीमद भगवत की कथा सुनाई थी । अक्षय वट वृक्ष विशिष्टता है कि यह कभी अपनी पत्तियों को नहीं छोड़ता है । वृक्ष की शखाएं 150 फुट तक ऊँची है और सभी दिशाओं में फैली है । यहां तक कि पेड़ की शाखाएं ठीक नीचे पहाड़ी के किनारे से भी बाहर आ रही है। एक शाखा तो देखने में भगवान गणेश के समान लगती है। आश्रम के इस परिसर में कई देवताओं के मंदिर स्थापित है । जिसमें वृक्ष के करीब एक मंदिर में शुक्देव गोस्वामी जी राजा परीक्षित को कथा सुनाते हुए की मूर्तियाँ स्थापित है ।

शुकतीर्थ के पूर्व में गंगा की एक धारा बहती है । जो हरिद्वार और ऋषिकेश में तेज और शक्तिशाली नदी की तुलना में बेहद शांत और शांतिपूर्ण है । कई तीर्थयात्री यहां आकर पवित्र स्नान करते हैं। हालांकि, यह गंगा की एक शाखा है जो गांव के आगे बहती है, जबकि गंगा की मुख्य शाखा यहाँ से 3 से 4 किलोमीटर दूर है। यह वही क्षेत्र है जहां अर्जुन के पोते राजा परीक्षित ने अपना शरीर छोड़ था ।

शुक्रताल की नक्षत्र वाटिका

शुक्रताल की नक्षत्र वाटिका पर्यटकों के आकर्षण का केंद्र है। पौराणिक नगरी शुक्रताल आने वाले पर्यटक व श्रद्धालु नक्षत्र वाटिका जरूर जाते हैं। नक्षत्र वाटिका की सुंदरता पर्यटकों को अपनी ओर खिंचने पर विवश कर देती है। यहां का सौंदर्य लोगों को आकर्षित करता है। हरियाली से परिपूर्ण नक्षत्र वाटिका पर्यावरण के दृष्टिकोण से भी बेहतर साबित हो रही है। समय-समय पर नक्षत्र वाटिका के सुंदरीकरण व सुधार के लिए प्रशासन व नेताओं से सहयोग भी मिलता रहता है। नक्षत्र वाटिका की देखरेख का जिम्मा पांच सदस्यीय टीम को दी गई है, जो इसकी निगरानी करती है।

महाभारतकालीन पौराणिक तीर्थनगरी शुक्रताल में गंगा किनारे स्थापित हनुमद्धाम नक्षत्र वाटिका नक्षत्र, नव ग्रह व पंचवटी वृक्षों के कारण आकर्षण का केंद्र बनी हुई है। दूरदराज क्षेत्रों से श्रद्धालु देखने आते हैं। हनुमद्धाम के पीठाधीश्वर स्वामी केशवानंदजी महाराज का कहना है कि भारतीय संस्कृति में वृक्षों और नक्षत्रों को मानव जीवन की भावुकता से उत्कर्ष आनंदानुभूति से अभिन्न माना गया है। ऋषियों की संस्कृति के अनुसार प्रत्येक नक्षत्र का वृक्ष भी निश्चित है जो मनुष्य अपने जन्म नक्षत्र वृक्ष का सेवा भाव से पालन-पोषण, वर्धन और रक्षा करता है उस मानव के जीवन में पुण्य की प्राप्ति होकर हर प्रकार से कल्याण होता है। हनुमद्धाम नक्षत्र वाटिका में रोपित सभी नक्षत्र, नव ग्रह, पंचवटी व वृक्षों एवं अन्य पुष्पों का दृश्य बड़ा ही मनोरम एवं दर्शनीय है, जिसका रक्षण, विकास संवर्धन सभी के सहयोग से ही संभव हो सका है। नक्षत्र वाटिका का लोकार्पण आठ अप्रैल 2001 को तत्कालीन राज्यपाल विष्णुकांत शास्त्री ने अपने ही जन्म नक्षत्र का वृक्ष जामुन का रोपण कर किया था।

नक्षत्र वाटिका की शोभा बढ़ा रहे वृक्ष

नक्षत्र वाटिका में कुचिला, आंवला, गूलर, जामुन, खैर, शीशम, बांस, पीपल, नांगकेसर, बरगद, ढाक, पाकड, रीठा, बेल, अर्जुन, विकंकत, मोलश्री, चीड़, साल, जलवेतस, कटहल, मदार, शमी, कदंब, आम, नीम, महुआ के साथ देवताओं के कहे जाने वाले पेड़ कल्पवृक्ष भी स्थापित हैं।

बच्चों के मनोरंजन को बनी है पशु पक्षियों की प्रतिमाएं नक्षत्र वाटिका में बच्चों के मनोरंजन को पशु पक्षियों मोर, मगरमच्छ, शेर, सर्प, डाइनासोर, मछलियां, जिराफ, हाथी व मेढक की मनमोहक पाषाण प्रतिमाएं स्थापित हैं। वाटिका में बालक प्रतिमाओं के साथ दिन भर आनंद लेते हुए साथ खूब फोटो ¨खचवाते हैं। नक्षत्र वाटिका के मुख्य द्वार पर खड़े दो पहरेदारों की प्रतिमा भी श्रद्धालुओं को खूब लुभाती है।

गणेशधाम शुक्रताल

भगवान् गणेश को समर्पित गणेशधाम एक बहुत प्रसिद्ध मंदिर है। इस मंदिर का मुख्य आकर्षण गणेशजी की 35 फुट ऊँची भव्य प्रतिमा है। इस मूर्ती की स्थापना दो मुख्य स्थानीय व्यक्तियों ने कराई थी। गणेशधाम के पास दो नदियाँ बहती हैं जो इसकी प्राकृतिक सुंदरता को और अधिक बढ़ा देती हैं। इस मंदिर के परिसर के पास भगवान् हनुमान की एक भव्य मूर्ती भी है।

श्री पंचमुखी महादेव मंदिर

श्री सिद्ध रुद्रेश्वर पशुपतिनाथ महादेव पंचमुखी शिव मंदिर संभलहेड़ा – नेपाल के  पशुपतिनाथ मंदिर की तरह ही यह मंदिर बहुत पुराना शिव मंदिर है। नेपाल के  पशुपतिनाथ मंदिर के बाद इस मंदिर में विश्व का दूसरा बहुत खूबसूरत पंचमुमुखी शिवलिंग स्थापित है जो बहुत महंगे पत्थर कासौटी द्वारा बनाया गया है। इस मंदिर में मां गंगा, गणेश गौरी, लक्ष्मी-नारायण और गरुण देवता की मूर्ति भी स्थापित हैं । यह गांव संभलहेड़ा (एक बहुत छोटा गांव) जानसठ तहसील हेड कवाटर से लगभग 8 किलोमीटर दूर है ।

Galary Image: 
shukrataal Ganesh Dham muzaffaranagar
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शुक्रताल गणेश धाम मुजफ्फरनगर
shukrataal ganga snaan Muzaffarnagar
शुक्रताल गंगा स्नान मुजफ्फरनगर
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shukrataal kee nakshatr vaatika muzaffaranagar
shukrataal shree panchamukhee mahaadev mandir muzaffaranagar
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शुक्रताल मुजफ्फरनगर
शुक्रतीर्थ शुक्रताल अक्षय वट
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