
भारत के 13वे राष्ट्रपति
पद बहाल - 25 जुलाई 2012 – 25 जुलाई 2017
प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह
नरेंद्र मोदी
उप राष्ट्रपति मोहम्मद हामिद अंसारी
पूर्वा धिकारी प्रतिभा पाटिल
उत्तरा धिकारी राम नाथ कोविन्द
भारत के वित्त मंत्री
पद बहाल - 24 जनवरी 2009 – 26 जून 2012
प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह
पूर्वा धिकारी मनमोहन सिंह
उत्तरा धिकारी मनमोहन सिंह
पद बहाल - 15 जनवरी 1982 – 31 दिसम्बर 1984
प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी
राजीव गाँधी
पूर्वा धिकारी रामास्वामी वेंकटरमण
उत्तरा धिकारी विश्वनाथ प्रताप सिंह
भारत के विदेश मंत्री
पद बहाल - 10 फरबरी 1995 – 16 मई 1996
प्रधानमंत्री पी.वी. नरसिम्हा राव
पूर्वा धिकारी दिनेश सिंह
उत्तरा धिकारी सिकन्दर बख्त
भारत के रक्षा मंत्री
पद बहाल - 22 मई 2004 – 26 अक्टूबर 2006
प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह
पूर्वा धिकारी ज्योर्ज फ़र्नान्डिस
उत्तरा धिकारी ए. के. एंटोनी
भारतीय योजना आयोग के उपाध्यक्ष
पद बहाल - 24 जून 1991 – 15 मई 1996
प्रधानमंत्री पी॰वी॰ नरसिम्हा राव
पूर्वा धिकारी मोहन धारिया
उत्तरा धिकारी मधु दण्डवते
जन्म 11 दिसम्बर 1935
ग्राम मिराती, बीरभूम जिला, ब्रिटिश भारत
मृत्यु 31 अगस्त 2020 (आयु 84)
दिल्ली, भारत
जन्म का नाम प्रणव कुमार मुखर्जी
राजनीतिक दल भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (1969–86; 1989–2012)
अन्य राजनीतिक
संबद्धताऐं राष्ट्रीय समाजवादी काँग्रेस (1986 से 1989 तक)
जीवन संगी शुभ्रा मुखर्जी (विवाह 1957; निधन 2015)
बच्चे शर्मिष्ठा
अभिजीत
इन्द्रजीत
शैक्षिक सम्बद्धता कलकत्ता विश्वविद्यालय
धर्म हिन्दू
सम्मान भारत रत्न (2019) पद्म विभूषण (2008)
प्रारम्भिक जीवन
प्रणव मुखर्जी का जन्म पश्चिम बंगाल के वीरभूम जिले में किरनाहर शहर के निकट स्थित मिराती गाँव में एक ब्राह्मण परिवार में कामदा किंकर मुखर्जी और राजलक्ष्मी मुखर्जी के यहाँ हुआ था। उनके पिता 1920 से कांग्रेस पार्टी में सक्रिय होने के साथ पश्चिम बंगाल विधान परिषद में 1952 से 64 तक सदस्य और वीरभूम (पश्चिम बंगाल) जिला कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष रह चुके थे। उनके पिता एक सम्मानित स्वतन्त्रता सेनानी थे जिन्होंने ब्रिटिश शासन की खिलाफत के परिणामस्वरूप 10 वर्षो से अधिक जेल की सजा भी काटी थी। प्रणव मुखर्जी ने वीरभूम के सूरी विद्यासागर कॉलेज में शिक्षा प्राप्त की जो उस समय कलकत्ता विश्वविद्यालय से सम्बद्ध था। कलकत्ता विश्वविद्यालय से उन्होंने इतिहास और राजनीति विज्ञान में स्नातकोत्तर के साथ साथ कानून की डिग्री हासिल की। वे एक वकील और कॉलेज प्राध्यापक भी रह चुके हैं। उन्हें मानद डी.लिट उपाधि भी प्राप्त है। उन्होंने पहले एक कॉलेज प्राध्यापक के रूप में और बाद में एक पत्रकार के रूप में अपना कैरियर शुरू किया। वे बाँग्ला प्रकाशन संस्थान देशेर डाक (मातृभूमि की पुकार) में भी काम कर चुके हैं। प्रणव मुखर्जी बंगीय साहित्य परिषद के ट्रस्टी एवं अखिल भारत बंग साहित्य सम्मेलन के अध्यक्ष भी रहे।
राजनीतिक कैरियर
उनका संसदीय कैरियर करीब पाँच दशक पुराना है, जो 1969 में कांग्रेस पार्टी के राज्यसभा सदस्य के रूप में (उच्च सदन) से शुरू हुआ था। वे 1975, 1981, 1993 और 1999 में फिर से चुने गये। 1973 में वे औद्योगिक विकास विभाग के केंद्रीय उप मन्त्री के रूप में मन्त्रिमण्डल में शामिल हुए।
वे सन 1982 से 1984 तक कई कैबिनेट पदों के लिए चुने जाते रहे और और सन् 1982 में भारत के वित्त मंत्री बने। सन 1984 में, यूरोमनी पत्रिका के एक सर्वेक्षण में उनका विश्व के सबसे अच्छे वित्त मंत्री के रूप में मूल्यांकन किया गया।[6] उनका कार्यकाल भारत के अन्तर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) के ऋण की 1.1 अरब अमरीकी डॉलर की आखिरी किस्त नहीं अदा कर पाने के लिए उल्लेखनीय रहा। वित्त मंत्री के रूप में प्रणव के कार्यकाल के दौरान डॉ॰ मनमोहन सिंह भारतीय रिजर्व बैंक के गवर्नर थे। वे इंदिरा गांधी की हत्या के बाद हुए लोकसभा चुनाव के बाद राजीव गांधी की समर्थक मण्डली के षड्यन्त्र के शिकार हुए जिसने इन्हें मन्त्रिमणडल में शामिल नहीं होने दिया। कुछ समय के लिए उन्हें कांग्रेस पार्टी से निकाल दिया गया। उस दौरान उन्होंने अपने राजनीतिक दल राष्ट्रीय समाजवादी कांग्रेस का गठन किया, लेकिन सन 1989 में राजीव गान्धी के साथ समझौता होने के बाद उन्होंने अपने दल का कांग्रेस पार्टी में विलय कर दिया।उनका राजनीतिक कैरियर उस समय पुनर्जीवित हो उठा, जब पी.वी. नरसिंह राव ने पहले उन्हें योजना आयोग के उपाध्यक्ष के रूप में और बाद में एक केन्द्रीय कैबिनेट मन्त्री के तौर पर नियुक्त करने का फैसला किया। उन्होंने राव के मंत्रिमंडल में 1995 से 1996 तक पहली बार विदेश मन्त्री के रूप में कार्य किया। 1997 में उन्हें उत्कृष्ट सांसद चुना गया।
सन 1985 के बाद से वह कांग्रेस की पश्चिम बंगाल राज्य इकाई के भी अध्यक्ष हैं। सन 2004 में जब कांग्रेस ने गठबन्धन सरकार के अगुआ के रूप में सरकार बनायी, तो कांग्रेस के प्रधानमन्त्री मनमोहन सिंह सिर्फ एक राज्यसभा सांसद थे। इसलिए जंगीपुर (लोकसभा निर्वाचन क्षेत्र) से पहली बार लोकसभा चुनाव जीतने वाले प्रणव मुखर्जी को लोकसभा में सदन का नेता बनाया गया। उन्हें रक्षा, वित्त, विदेश विषयक मन्त्रालय, राजस्व, नौवहन, परिवहन, संचार, आर्थिक मामले, वाणिज्य और उद्योग, समेत विभिन्न महत्वपूर्ण मन्त्रालयों के मन्त्री होने का गौरव भी हासिल है। वह कांग्रेस संसदीय दल और कांग्रेस विधायक दल के नेता रह चुके हैं जिसमें देश के सभी कांग्रेस सांसद और विधायक शामिल होते हैं। इसके अतिरिक्त वे लोकसभा में सदन के नेता बंगाल प्रदेश कांग्रेस पार्टी के अध्यक्ष कांग्रेस के नेतृत्व वाली सरकार के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की मंत्रिपरिषद में केन्द्रीय वित्त मन्त्री भी रहे। लोकसभा चुनावों से पहले जब प्रधानमन्त्री मनमोहन सिंह ने अपनी बाई-पास सर्जरी कराई, प्रणव दा विदेश मन्त्रालय में केन्द्रीय मंत्री होने के बावजूद राजनैतिक मामलों की कैबिनेट समिति के अध्यक्ष और वित्त मन्त्रालय में केन्द्रीय मन्त्री का अतिरिक्त प्रभार लेकर मन्त्रिमण्डल के संचालन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते रहे।
अन्तर्राष्ट्रीय भूमिका
10 अक्टूबर 2008 को मुखर्जी और अमेरिकी विदेश सचिव कोंडोलीजा राइस ने धारा 123 समझौते पर हस्ताक्षर किए। वे अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष के विश्व बैंक एशियाई विकास बैंक और अफ्रीकी विकास बैंक के प्रशासक बोर्ड के सदस्य भी थे।
सन 1984 में उन्होंने आईएमएफ और विश्व बैंक से जुड़े ग्रुप-24 की बैठक की अध्यक्षता की। मई और नवम्बर 1995 के बीच उन्होंने सार्क मन्त्रिपरिषद सम्मेलन की अध्यक्षता की।
राजनीतिक दल में भूमिका
मुखर्जी को पार्टी के भीतर तो सम्मान मिला ही सामाजिक नीतियों के क्षेत्र में भी काफी सम्मान मिला है। अन्य प्रचार माध्यमों में उन्हें बेजोड़ स्मरणशक्ति वाला आंकड़ा प्रेमी और अपना अस्तित्व बरकरार रखने की अचूक इच्छाशक्ति रखने वाले एक राजनेता के रूप में वर्णित किया जाता है।
जब सोनिया गान्धी अनिच्छा के साथ राजनीति में शामिल होने के लिए राजी हुईं तब प्रणव उनके प्रमुख परामर्शदाताओं में से रहे जिन्होंने कठिन परिस्थितियों में उन्हें उदाहरणों के जरिये बताया कि उनकी सास इंदिरा गांधी इस तरह के हालात से कैसे निपटती थीं। मुखर्जी की अमोघ निष्ठा और योग्यता ने ही उन्हें यूपीए चेयरपर्सन सोनिया गांधी और प्रधान मन्त्री मनमोहन सिंह के करीब लाया और इसी वजह से जब 2004 में कांग्रेस पार्टी सत्ता में आयी तो उन्हें भारत के रक्षा मंत्री के प्रतिष्ठित पद पर पहुँचने में मदद मिली।
सन 1991 से 1996 तक वे योजना आयोग के उपाध्यक्ष पद पर आसीन रहे।
2005 के प्रारम्भ में पेटेण्ट संशोधन बिल पर समझौते के दौरान उनकी प्रतिभा के दर्शन हुए। कांग्रेस एक आईपी विधेयक पारित करने के लिए प्रतिबद्ध थी लेकिन संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन में शामिल वाममोर्चे के कुछ घटक दल बौद्धिक सम्पदा के एकाधिकार के कुछ पहलुओं का परम्परागत रूप से विरोध कर रहे थे। रक्षा मन्त्री के रूप में प्रणव मामले में औपचारिक रूप से शामिल नहीं थे लेकिन बातचीत के कौशल को देखकर उन्हें आमन्त्रित किया गया था। उन्होंने मार्क्सवादी कम्युनिष्ट नेता ज्योति बसु सहित कई पुराने गठबन्धनों को मनाकर मध्यस्थता के कुछ नये बिंदु तय किये जिसमे उत्पाद पेटेण्ट के अलावा और कुछ और बातें भी शामिल थीं तब उन्हें वाणिज्य मन्त्री कमल नाथ सहित अपने सहयोगियों यह कहकर मनाना पड़ा कि: "कोई कानून नहीं रहने से बेहतर है एक अपूर्ण कानून बनना।"अंत में 23 मार्च 2005 को बिल को मंजूरी दे दी गई।
भ्रष्टाचार पर विचार
मुखर्जी की खुद की छवि पाक-साफ है परन्तु सन् 1998 में रीडिफ.कॉम को दिये गये एक साक्षात्कार में उनसे जब कांग्रेस सरकार जिसमें वह विदेश मंत्री थे पर लगे भ्रष्टाचार के बारे में पूछा गया था तो उन्होंने कहा - "भ्रष्टाचार एक मुद्दा है। घोषणा पत्र में हमने इससे निपटने की बात कही है। लेकिन मैं यह कहते हुए क्षमा चाहता हूँ कि ये घोटाले केवल कांग्रेस या कांग्रेस सरकार तक ही सीमित नहीं हैं। बहुत सारे घोटाले हैं। विभिन्न राजनीतिक दलों के कई नेता उनमें शामिल हैं। तो यह कहना काफी सरल है कि कांग्रेस सरकार भी इन घोटालों में शामिल थी।
विदेश मन्त्री : अक्टूबर 2006
24 अक्टूबर 2006 को जब उन्हें भारत का विदेश मन्त्री नियुक्त किया गया, रक्षा मंत्रालय में उनकी जगह ए.के. एंटनी ने ली।
प्रणव मुखर्जी के नाम पर एक बार भारतीय राष्ट्रपति जैसे सम्मान जनक पद के लिए भी विचार किया गया था। लेकिन केंद्रीय मंत्रिमण्डल में व्यावहारिक रूप से उनके अपरिहार्य योगदान को देखते हुए उनका नाम हटा लिया गया। मुखर्जी की वर्तमान विरासत में अमेरिकी सरकार के साथ असैनिक परमाणु समझौते पर भारत-अमेरिका के सफलतापूर्वक हस्ताक्षर और परमाणु अप्रसार सन्धि पर दस्तखत नहीं होने के बावजूद असैन्य परमाणु व्यापार में भाग लेने के लिए परमाणु आपूर्तिकर्ता समूह के साथ हुए हस्ताक्षर भी शामिल हैं। सन 2007 में उन्हें भारत के दूसरे सबसे बड़े नागरिक सम्मान पद्म विभूषण से नवाजा गया।
वित्त मन्त्री
मनमोहन सिंह की दूसरी सरकार में मुखर्जी भारत के वित्त मन्त्री बने। इस पद पर वे पहले 1980 के दशक में भी काम कर चुके थे। 6 जुलाई 2009 को उन्होंने सरकार का वार्षिक बजट पेश किया। इस बजट में उन्होंने क्षुब्ध करने वाले फ्रिंज बेनिफिट टैक्स और कमोडिटीज ट्रांसक्शन कर को हटाने सहित कई तरह के कर सुधारों की घोषणा की। उन्होंने ऐलान किया कि वित्त मन्त्रालय की हालत इतनी अच्छी नहीं है कि माल और सेवा कर लागू किये बगैर काम चला सके। उनके इस तर्क को कई महत्वपूर्ण कॉरपोरेट अधिकारियों और अर्थशास्त्रियों ने सराहा। प्रणव ने राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारण्टी अधिनियम लड़कियों की साक्षरता और स्वास्थ्य जैसी सामाजिक क्षेत्र की योजनाओं के लिए समुचित धन का प्रावधान किया। इसके अलावा उन्होंने राष्ट्रीय राजमार्ग विकास कार्यक्रम बिजलीकरण का विस्तार और जवाहरलाल नेहरू राष्ट्रीय शहरी नवीकरण मिशन सरीखी बुनियादी सुविधाओं वाले कार्यक्रमों का भी विस्तार किया। हालांकि कई लोगों ने 1991 के बाद लगातार बढ़ रहे राजकोषीय घाटे के बारे में चिन्ता व्यक्त की परन्तु मुखर्जी ने कहा कि सरकारी खर्च में विस्तार केवल अस्थायी है और सरकार वित्तीय दूरदर्शिता के सिद्धान्त के प्रति पूरी तरह प्रतिबद्ध है।
राष्ट्रपति चुनाव
मुखर्जी को काफी राजनीतिक साज़िश के बाद 15 जून 2012 को संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन के राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार के रूप में नामित किया गया था। चुनाव 19 जुलाई 2012 को होने थे और परिणाम 22 जुलाई 2012 को घोषित होने की उम्मीद थी। राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) के उम्मीदवार पी. ए. संगमा थे। 28 जून को राष्ट्रपति चुनाव के लिए अपना नामांकन दाखिल करने के लिए मुखर्जी ने 26 जून 2012 को सरकार से इस्तीफा दे दिया।
25 जुलाई, 2012 को नई दिल्ली में संसद के केंद्रीय कक्ष में शपथ ग्रहण समारोह में प्रधान न्यायाधीश एस एच कपाड़िया प्रणब मुखर्जी को भारत के राष्ट्रपति पद की शपथ दिलाई गई। चुनाव में मुखर्जी को 7,13,763 वोट मिले जबकि संगमा को 3,15,987 मत मिले थे। परिणामों की आधिकारिक घोषणा से पहले अपने आवास के बाहर दिए गए अपने विजय भाषण में उन्होंने कहा: मैं आप सभी के प्रति अपनी गहरी कृतज्ञता व्यक्त करना चाहता हूं जो प्रतीक्षा कर रहे हैं। आंकड़ा 7 लाख के पार हो गया सिर्फ एक राज्य बचा है। अंतिम आंकड़ा रिटर्निंग ऑफिसर से आएगा। इस उच्च पद पर मुझे चुनने के लिए मैं भारत की जनता को धन्यवाद देना चाहता हूं। लोगों का उत्साह गर्मजोशी उल्लेखनीय थी। मैंने इस देश के लोगों से संसद से जितना दिया है उससे कहीं अधिक पाया है। अब मुझे राष्ट्रपति के रूप में संविधान की रक्षा और बचाव का दायित्व सौंपा गया है। मैं कोशिश करूंगा और लोगों के भरोसे को सही साबित करूंगा।
मुखर्जी को 25 जुलाई 2012 को भारत के मुख्य न्यायाधीश द्वारा शपथ दिलाई गई भारत के राष्ट्रपति का पद संभालने वाले पहले बंगाली बने। पद की शपथ लेने के बाद उन्होंने कहा कि हम आतंक के चौथे विश्व युद्ध (तीसरा शीत युद्ध था) के बीच में हैं और कई वर्षों के युद्ध में शांति के मिनट क्या हासिल कर सकते हैं यह हासिल नहीं किया जा सकता है।
भारत के राष्ट्रपति
आपराधिक कानून (संशोधन) अध्यादेश 2013 को 3 फरवरी 2013 को प्रणब मुखर्जी द्वारा प्रख्यापित किया गया था, जिसमें यौन अपराधों से संबंधित कानूनों पर भारतीय दंड संहिता भारतीय साक्ष्य अधिनियम और दंड प्रक्रिया संहिता 1973 में संशोधन का प्रावधान किया गया था। जुलाई 2015 तक राष्ट्रपति मुखर्जी ने याकूब मेमन अजमल कसाब और अफ़ज़ल गुरु सहित 24 दया याचिकाओं को खारिज कर दिया था। प्रणब मुखर्जी भारत के पहले राष्ट्रपति बने जिन्होंने अपने कार्यकाल में मौत की सजा पाए कैदियों के लिए सभी दया याचिकाओं का जवाब दिया और पूर्व राष्ट्रपतियों की याचिकाओं का भी जवाब दिया।
जनवरी 2017 में मुखर्जी ने घोषणा की कि वह "उम्र बढ़ने और असफल स्वास्थ्य" का हवाला देते हुए 2017 का राष्ट्रपति चुनाव नहीं लड़ेंगे।
बीमारी और मौत
COVID-19 महामारी के दौरान 10 अगस्त 2020 को मुखर्जी ने ट्विटर पर घोषणा की कि उन्होंने अपने मस्तिष्क में रक्त के थक्के को हटाने के लिए एक सर्जरी से पहले COVID-19 के लिए सकारात्मक परीक्षण किया था। बाथरूम में दुर्घटनावश फिसलकर गिरने के बाद उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया गया था। वह दिल्ली में सेना के अनुसंधान और रेफरल (आर एंड आर) अस्पताल में वेंटिलेटर सपोर्ट पर और गंभीर स्थिति में था।
13 अगस्त को अस्पताल ने बताया कि मस्तिष्क की सर्जरी के बाद मुखर्जी गहरे कोमा में थे हालांकि उनके महत्वपूर्ण पैरामीटर स्थिर रहे। 19 अगस्त को आर एंड आर ने कहा कि मुखर्जी के स्वास्थ्य की स्थिति में गिरावट आई थी क्योंकि उन्हें फेफड़ों में संक्रमण हो गया था। 25 अगस्त को उसके गुर्दे के मापदंड "थोड़े विक्षिप्त" हो गए, जिसके कुछ दिनों बाद हालत और बिगड़ गई।
मुखर्जी का 31 अगस्त 2020 को 84 वर्ष की आयु में निधन हो गया जिसकी पुष्टि उनके बेटे अभिजीत मुखर्जी ने ट्विटर के माध्यम से की। उनकी मृत्यु तब हुई जब अस्पताल ने पुष्टि की कि उनका स्वास्थ्य उस दिन जल्दी बिगड़ गया था यह बताते हुए कि वह एक दिन पहले से सेप्टिक सदमे में थे जो उनके फेफड़ों के संक्रमण के कारण हुआ था।
भारत सरकार ने 31 अगस्त से 6 सितंबर के बीच सात दिनों के राजकीय शोक की घोषणा की जिसके तहत राष्ट्रीय ध्वज उन सभी भवनों पर आधा झुका रहेगा जहाँ इसे नियमित रूप से फहराया जाता है। पश्चिम बंगाल राज्य सरकार ने सम्मान के निशान के रूप में अगले दिन के लिए सरकारी कार्यालयों को बंद करने की घोषणा की।
मुखर्जी का अंतिम संस्कार अगले दिन 1 सितंबर को लोधी रोड श्मशान घाट में पूरे राजकीय सम्मान के साथ किया गया। देश में COVID-19 महामारी प्रतिबंधों के कारण उनके शरीर को गन कैरिज के बजाय एक वैन में श्मशान घाट लाया गया था। उनकी अस्थियां हरिद्वार में गंगा नदी में प्रवाहित की गईं।
सम्मान और विशिष्टता
न्यूयॉर्क से प्रकाशित पत्रिका यूरोमनी के एक सर्वेक्षण के अनुसार वर्ष 1984 में दुनिया के पाँच सर्वोत्तम वित्त मन्त्रियों में से एक प्रणव मुखर्जी भी थे।
उन्हें सन् 1997 में सर्वश्रेष्ठ सांसद का अवार्ड मिला।
वित्त मन्त्रालय और अन्य आर्थिक मन्त्रालयों में राष्ट्रीय और आन्तरिक रूप से उनके नेतृत्व का लोहा माना गया। वह लम्बे समय के लिए देश की आर्थिक नीतियों को बनाने में महत्वपूर्ण व्यक्ति के रूप में जाने जाते हैं। उनके नेत़त्व में ही भारत ने अन्तर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष के ऋण की 1.1 अरब अमेरिकी डॉलर की अन्तिम किस्त नहीं लेने का गौरव अर्जित किया। उन्हें प्रथम दर्जे का मन्त्री माना जाता है और सन 1980-1985 के दौरान प्रधानमन्त्री की अनुपस्थिति में उन्होंने केन्द्रीय मन्त्रिमण्डल की बैठकों की अध्यक्षता की।
उन्हें सन् 2008 के दौरान सार्वजनिक मामलों में उनके योगदान के लिए भारत के दूसरे सर्वोच्च नागरिक पुरस्कार पद्म विभूषण से नवाजा गया।
प्रणव मुखर्जी को 26 जनवरी 2019 में भारत रत्न से सम्मानित किया गया।
