
राज सिंह प्रथम
मेवाड़ के महाराणा
शासनावधि - 1652–1680
पूर्ववर्ती - जगत सिंह प्रथम
उत्तरवर्ती - जय सिंह (मेवाड़ के)
जन्म - 24 सितम्बर 1629
निधन - 22 अक्टूबर 1680 (उम्र 51)
संतान - जय सिंह (मेवाड़ के) राजीबा बाई बेगम (1676–1707)
पिता - जगत सिंह प्रथम
राज सिंह प्रथम (24 सितम्बर 1629 – 22 अक्टूबर 1680) मेवाड़ के शिशोदिया राजवंश के शासक (राज्यकाल 1652 – 1680) थे। वे जगत सिंह प्रथम के पुत्र थे। उन्होने औरंगजेब के अनेकों बार विरोध किया।
राजनगर (कांकरोली / राजसमंद) में राजा महाराणा राज सिंह जी का जन्म 24 सितंबर 1629 को हुआ। उनके पिता महाराणा जगत सिंह जी और मां महारानी मेडतणीजी थीं। मात्र 23 वर्ष की छोटी उम्र में उनका राज्याभिषेक हुआ था। वे न केवल एक कलाप्रेमी, जन जन के चहेते वीर और दानी पुरुष थे बल्कि वे धर्मनिष्ठ प्रजापालक और बहुत कुशल शासन संचालन भी थे।
उनके राज्यकाल के समय लोगों को उनकी दानवीरता के बारे में जानने का मौका मिला। उन्होने कई बार सोने चांदी अनमोल धातुएं रत्नादि के तुलादान करवाये और योग्य लोगों को सम्मानित किया। राजसमंद झील के किनारे नौचोकी पर बड़े-बड़े पचास प्रस्तर पट्टों पर उत्कीर्ण राज प्रशस्ति शिलालेख बनवाये जो आज भी नौचोकी पर देखे जा सकते हैं। इनके अलावा उन्होनें अनेक बाग बगीचे, फव्वारे, मंदिर, बावडियां, राजप्रासाद, द्धार और सरोवर आदि भी बनवाये जिनमें से कुछ कालान्तर में नष्ट हो गये। उनका सबसे बड़ा कार्य राजसमंद झील पर पाल बांधना और कलापूर्ण नौचोकी का निर्माण कहा जा सकता है। किशनगढ़ के राजा रूप सिंह की पुत्री चारुमती पर औरंगजेब की नजर पड़ गई औरंगजेब उसे विवाह करना चाहता था चारुमती ये जान गई और उसने महाराणा राजसिंह को पत्र लिखा और महाराणा राजसिंह को पत्र प्राप्त हुआ और उन्होने चारुमती से विवाह कर लिया
वे एक महान ईश्वर भक्त भी थे। द्वारिकाधीश जी और श्रीनाथ जी के मेवाड़ में आगमन के समय स्वयं पालकी को उन्होने कांधा दिया और स्वागत किया था। उन्होने बहुत से लोगों को अपने शासन काल में आश्रय दिया, उन्हे दूसरे आक्रमणकारियों से बचाया व सम्मानपूर्वक जीने का अवसर दिया। उन्होने एक राजपूत राजकुमारी चारूमति के सतीत्व की भी रक्षा की।
उन्होने ओरंगजेब को भी जजिया कर हटाने और निरपराध भोली जनता को परेशान ना करने के बारे में पत्र भेज डाला। कहा जाता है कि उस समय ओरंगजेब की शक्ति अपने चरम पर थी, पर प्रजापालक राजा राजसिहजी ने इस बात की कोई परवाह नहीं की।
राणा राज सिंह स्थापत्य कला के बहुत प्रेमी थे। कुशल शिल्पकार, कवि, साहित्यकार और दस्तकार उनके शासन के दौरान हमेशा उचित सम्मान पाते रहे। वीर योद्धाओं व योग्य सामंतो को वे खुद सम्मानित करते थे।
राजसमंद झील
उन्होंने 1676 में कांकरोली में प्रसिद्ध राजसमंद झील का भी निर्माण किया, जहाँ भारत की स्वतंत्रता से पहले समुद्री विमान उतरते थे। उन्होंने राज प्रशस्ति काव्य का निर्माण का आदेश दिया, जिसे बाद में झील के स्तंभों पर उकेरा गया। इस झील को राजसमुद्र के नाम से भी जाना जाता है।
झील ने किसानों को पर्याप्त पानी उपलब्ध कराया जिससे उत्पादकता में वृद्धि हुई और अकाल प्रभावित क्षेत्रों को भी राहत मिली। माना जाता है कि राज सिंह को अपने बेटे, पत्नी, एक ब्राह्मण और एक चारण की हत्या से मुक्त होने के लिए एक बड़ा तालाब या झील निर्माण करवाने का सुझाव दिया गया था।
विशेष
महाराणा राज सिंह जी के समय जोधपुर के मंडोर से चार भाई अमेट क्षेत्र के पास आये थे जिसमे दो भाई वहा पर ही बस गए जिसमे से एक का नाम गोविंध् सिंह इन्दा एवं दूसरे का नाम रतन सिंह परिहार था। महाराणा राज सिंह जी ने उन दोनो को जागिरि दी एवं उन दोनो के नाम पर एक गाँव विकसित किया गोविंध् सिंह जी के नाम पर गोविंदहगढ ( गुगली) और रतन सिंह के नाम पर रतन गढ़।
महाराणा राज सिंह जी के मंत्री मंडल मे रतन सिंह जी का विशेष योगदान रहा है जिससे उन्हे एवं गोविंध् सिंह जी को महाराव की उपाधि मिली आज भी इन गाँव के लोग अपने नाम के आगे राव लागाते है एवं पीछे परिहार लागाते है।
महाराणा राज सिंह जी जब औरंगजेब के साथ लड़े तब उनके साथ महाराव रतन सिंह जी भी थे।
सितंबर, 1657 ई. में जब शाहजहाँ अस्वस्थ हुआ तो उसके पुत्रो में उत्तराधिकारी युद्ध छिड़ गया। इस अव्यवस्था का लाभ उठाते हुए ‘टीका दौड़ उत्सव का बहाना बनाकर (जिसमें मुहर्त से वर्ष में पहली बार शिकार का आयोजन राज्य की सीमा से बाहर किया जाता था।) राजसिंह ने 2 मई, 1658 ई. से अपने राज्य के तथा बाहरी मुगल थानों पर हमला कर दिया। राणा इस प्रकार एक-एक कर दूसरे राज्यों को लूटने लगा।
राजसिंह खारी नदी के तट पर पहँचा तो वहाँ उसे दाराशिकोह की सहायता का एक पत्र मिला। राजसिंह जानता था कि औरंगजेब को फतेहाबाद से विजय मिल चुकी है और भविष्य में दिल्ली की। शक्ति और सत्ता का केंद्र बिंदु औरंगजेब ही होगा। राजसिंह ने दारा को प्रत्युत्तर में यह लिखकर टाल दिया की उसके लिए तो सभी राजकुमार बराबर हैं। औरंगजेब राजसिंह के इस सकारात्मक व्यवहार से अत्यधिक प्रसन्न हुआ और औरगजेब मुगल बादशाह बनते ही
राजसिंह के पद को 6000 बढ़ाकर उपहार में डंगरपुर व बाँसवाड़ा के परगने दे दिए। मेवाड़-मुगल संबंध ज्यादा दिनों तक अच्छे नहीं रहे। औरंगजेब व राजसिंह के मध्य काफी तनाव उत्पन्न हो गया
जिसके कारण निम्न हैं-
औरंगजेब ने मारवाड़ के राठौड़ों की छोटी शाखा रूपनगर( किशनगढ़ ) की राजकुमारी चारूमति से विवाह करने का निश्चय कर सगाई का डोला किशनगढ़ भेजा। चारूमति के भाई मानसिंह ने विवश होकर यह संबंध स्वीकार कर लिया था। राजकुमारी इस शादी के प्रस्ताव से दुखी होकर व महाराणा जिसिंह की वीरता से मुग्ध होकर मेवाड़ के महाराणा राजसिंह पास एक संदेश भिजवाया उसमें लिखा था कि “क्या राजहंसी को बगुले की सहेली होना पड़ेगा। महाराज में आपसे निश्चय कहती हूँ कि जो आप इस विपत्ति से मेरा उद्धार नहीं करेंगे तो मैं अवश्य ही आत्मघात करके प्राणों को त्याग दूंगी ।” राजसिंह ने तुरंत उसकी सहायता की और उससे शादी कर उसे मुस्लिम हाथों से बचाया।
हाड़ा रानी
यह बूंदी के जागीरदार संग्रामसिंह की पुत्री थी। हाड़ी रानी के नाम से विख्यात रानी का मूल नाम सलह/सहल कँवर था। विवाह सलूंबर के राव रतनसिंह चूड़ावत के साथ हुआ था। विवाह के दूसरे दिन ही राव रतनसिंह को मेवाड़ के महाराणा राजसिंह की ओर से औरंगजेब के विरुद्ध युद्ध करने के लिए देसूरी की नाल के युद्ध में जाना पड़ा। रतनसिंह को अपनी नई नवेली रानी की याद सताने लगी तो उसने अपने सेवक को रानी के पास भेजकर रानी की निशानी मंगाई। हाडा रानी ने निशानी के तौर पर अपना सिर काटकर रतनसिंह चुडावत के पास भेज दिया था।
इस युद्ध में रतनसिंह चूड़ावत मारे गए उनकी ऐतिहासिक छतरी 1664 ई. में देसुरी की नाल (पाली व राजसमंद की सीमा पर) में बनी हुई। प्रसिद्ध कवि मेघराज ‘मकल’ ने इसी हाड़ा रानी पर ‘सैनाणी’ नामक कविता लिखी जिसके बोल हैं- “चूंडावत माँगी सैनाणी सिर काट दे दियो क्षत्राणी”
औरंगजेब कट्टर मुसलमान था। इसीलिए उसने 1669 ई. में एक फरमान जारी कर मंदिरों को तोड़ने व हिंदुओं की पाठशालाओं और मूर्तियों को नष्ट करने की आज्ञा दी। बादशाह के डर से श्रीनाथजी की मूर्तियों को लेकर भागे गोसाइयों को राजसिंह ने शरण देकर सिहाड़ (नाथद्वारा) में श्रीनाथजी की मूर्ति, द्वारिकाधीश की मूर्ति कांकरोली (राजसमंद) में स्थापित कर वहाँ मंदिर बनवाया। राजसिंह ने 1664 ई. में उदयपुर में अंबा माता का मंदिर भी बनवाया।
औरंगजेब ने 2 अप्रैल, 1679 ई. में हिंदुओं पर जजिया कर (गैर मुसलमानों पर लगाया जाने वाले कर) लगाया तब राजसिंह ने हिंदू राष्ट्र के अध्यक्ष की हैसियत से इसका विरोध किया।
राजसिंह ने औरंगजेब के विद्रोही मारवाड़ के अजीतसिंह व दुर्गादास राठौड़ को शरण दी थी। इस प्रकार मेवाड़ व मारवाड़ दोनों रियासतों के संबंध अच्छे बन गए। राजसिंह, दुर्गादास व अजीतसिंह तीनों ही औरंगजेब के कट्टर विरोधी हो गए।
उस समय सम्पूर्ण उत्तरी भारत में औरंगजेब का प्रतिरोध करने वाला एकमात्र शासक राजसिंह था। औरंगजेब इन तीनों की ताकत से बौखला गया क्योंकि इन तीनों ने मुगल राज्य की नींव हिला दी थी। औरंगजेब ने अपने पुत्र अकबर द्वितीय को मेवाड़ व मारवाड़ रियासत का दमन करने के लिए मेवाड़ भेजा। शहजादा अकबर शाही सेना के साथ मेवाड़ पहुँचा। मेवाड़ के महाराणा राजसिंह ने अकबर को राजगद्दी का लालच देकर अकबर के सेनापति तहव्वर खाँ के माध्यम से अपनी ओर मिला लिया।
अकबर द्वितीय ने जनवरी, 1681 ई. को पाली जिले के नाडोल कस्बे में स्वयं को भारत का सम्राट’ घोषित कर दिया।
इसका पता जब औरंगजेब को चला तो वह स्वयं उसके विद्रोह को दबाने के लिए आया। औरंगजेब ने विरोधियों की शक्ति को अधिक देखकर कूटनीति का प्रयोग करते हुए 15 जनवरी, 1681 ई. को औरंगजेब ने धोखे से शहजादे अकबर के सेनापति तहव्वर खाँ को मरवा दिया। औरंगजेब ने अकबर के नाम एक जाली पत्र उसकी। प्रशंसा में लिखकर राजसिंह व दुर्गादास के खेमे के बाहर डलवा दिया। जिसमें लिखा था, कि “बेटा हो तो तेरा जैसा जिसने मेरे दोनों दुश्मनों को एक साथ एक ही मैदान में ले आया।” राजसिंह व दुर्गादास ने इस पत्र को पढ़ा तो उनका दिमाग चकरा गया और अकबर को गद्दार समझकर उसे वहीं मैदान में छोड़कर अपनी रियासत में आ गए।
शहजादे अकबर ने सुबह उठकर देखा तो राजसिंह और दुर्गादास अपने खेमे में नहीं थे। उसने सोचा कि राजपूत जाति धोखा तो नहीं करती लेकिन इन्होंने मेरे साथ ऐसा क्यों किया। शहजादा अकबर वापस राजसिंह और दुर्गादास राठौड़ के पास गया तो उन्होंने उसे पत्र दिखाते हुए कहा कि “अच्छा बेटा तू हम दोनों को मरवाना चाहता था।” अकबर ने उनसे कहा कि “यह पत्र मेरे बाप के द्वारा लिखा गया जाली पत्र है। उसकी सोच हमारी सोच से हमेशा दो कदम आगे रहती है।” तब राजसिंह और दुर्गादास ने कहा कि शहजादे अकबर इस गलती के लिए हमें माफ कर दो। हम वापस तुम्हारा साथ देंगे। कुछ दिनों के बाद 1680 ई. में महाराणा राजसिंह को विष दे दिया गया जिस कारण राजसिंह की कुम्भलगढ़ दुर्ग में मृत्यु हो गई।
राजसिंह ने अपने साथियों व प्रजा में सैनिक जीवन की अभिव्यक्ति के लिए ‘विजय कट कातु’ की उपाधि धारण की। महाराणा राजसिंह ने अकाल राहत के तहत् राजसमंद झील का निर्माण करवाया।
