
महाराणा उदयसिंह प्रथम
मेवाड़ के राणा
शासनावधि - 1468 से 1473
पूर्ववर्ती महाराणा कुम्भा
उत्तरवर्ती राणा रायमल
निधन - 1473
पिता - महाराणा कुम्भा
उदय सिंह ने 1468 में अपने पिता राणा कुंभा की हत्या कर दी और उसके बाद हत्यारा (हत्यारा) के रूप में जाना जाने लगा। 1473 में खुद उदय की मृत्यु हो गई, मृत्यु का कारण कभी-कभी बिजली गिरने के परिणामस्वरूप बताया गया था लेकिन उनके पिता राणा कुंभा की मृत्यु का बदला लेने के लिए उनके अपने भाई राणा रायमल द्वारा भी हत्या किए जाने की संभावना थी।
मेवाड़ क्रॉनिकल वीर विनोद में कवि श्यामलदास द्वारा बिजली गिरने से हुई मौत का उल्लेख किया गया है जिसे जेम्स टॉड ने घियाथ शाह के बजाय दिल्ली के सुल्तान के बारे में गलत समझा।मालवा के सुल्तान यह शाह ही थे जो उदय सिंह को सहायता प्रदान करने के लिए सहमत हुए और बदले में उदय सिंह अपनी बेटी को शादी के लिए सहमत हुए। प्रस्तावित वैवाहिक गठबंधन का उद्देश्य दोनों राज्यों के बीच मैत्रीपूर्ण संबंध स्थापित करना था। लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था। बातचीत पूरी करके जब राणा उदय सिंह अपने शिविर में लौट रहे थे तो उन पर बिजली गिर गई और इस तरह पूरी योजना विफल हो गई और कोई शादी नहीं हुई। हालाँकि सूरजमल और सहसमल मालवा दरबार में बने रहे और सुल्तान पर अपनी पैतृक संपत्ति वापस पाने में मदद करने के लिए दबाव डालते रहे। सुल्तान घियाथ शाह अंततः उनकी सहायता करने के लिए सहमत हुए और अपनी सेना के साथ चित्तौड़ पर चढ़ाई की।
महाराणा उदय सिंह प्रथम को उदयकरण उदाह और उदा नामों से भी जाना जाता हैं। महाराणा उदय सिंह प्रथम महाराणा कुम्भा के पुत्र थे। महाराणा उदय सिंह प्रथम रघुवंशी राजपूत परिवार में जन्म लेने वाले और मेवाड़ के इतिहास में ऐसे राजा हुए जिन्होंने अपने माथे पर पिता की हत्या का टीका लगाया।
1468 ईस्वी में अपने पिता महाराणा कुम्भा की हत्या कर महाराणा उदय सिंह प्रथम ने स्वयं को मेवाड़ का राजा घोषित कर दिया। इन्हें एक क्रूर शासक के रूप में याद किया जाता हैं।
महाराणा उदय सिंह प्रथम ने वर्ष 1468 से लेकर 1473 तक मेवाड़ पर राज्य किया। 1473 ईस्वी में इनकी मृत्यु के पश्चात इनका भाई राणा रायमल इनका उत्तराधिकारी बना।
मेवाड़ के लोगों ने अबसे पहले किसी भी हिंदू राजा को अपने पिता के साथ ऐसा नीच व्यवहार करते हुए नहीं देखा था। बात स्पष्ट है कि ऐसी परिस्थितियों में उदय के प्रति मेवाड़ के लोग तटस्थ हो गए। महाराणा उदय सिंह प्रथम को अपने लोगों का अपने प्रति ऐसा व्यवहार बहुत अखरता था। वह अपने नीच कर्म की ओर जब भी देखता होगा तब वह अपनी प्रजा के अपने प्रति व्यवहार और अपने द्वारा किए गए नीच कर्म को भी देखता होगा । उस समय उसके लिए ये दोनों स्थितियां ही दु:ख, निराशा और पश्चाताप का कारण बन जाती होंगी। दु:ख, निराशा और पश्चाताप तीनों से ही जिस विक्षोभ का निर्माण होता है उसमें व्यक्ति हठीला, दुराग्रही और क्रोधी होता चला जाता है । अंत में वह क्रूर होकर रह जाता है। बस, यही कारण था कि महाराणा उदय सिंह प्रथम अपने मौलिक स्वभाव और उसके कारण अपने चारों ओर सृजित हुई परिस्थितियों के वशीभूत होकर अपने मेवाड़ की प्रजा के लिए भी किसी रावण से कम नहीं था। वह प्रजा पर अत्याचार करके प्रसन्न होता था।
उदय सिंह प्रथम ने पिता की हत्या करते समय सोचा होगा कि सत्ता में आने के पश्चात लोग अपने आप ही उसे राजा स्वीकार कर लेंगे और शक्ति सत्ता के सामने उसका विरोध करने का साहस किसी का भी नहीं होगा। ऐसा सोचते समय महाराणा यह भूल गया था कि भारतवर्ष के लोग संस्कार को प्राथमिकता देते हैं। मुसलमानों के यहां शक्ति और सत्ता को सलाम करने वाले हो सकते हैं पर भारत में आर्य हिंदू समाज के भीतर ऐसा कभी नहीं होता। वैदिक संस्कारों में तो प्रारंभ से ही क्रूर, अत्याचारी, भ्रष्ट और चोर राजा या शासक के विरुद्ध विद्रोह करने की शिक्षा दी जाती है।
ऐसी परिस्थितियों में मेवाड़ की स्थिति दिन – प्रतिदिन दयनीय होती जा रही थी। शासन में शिथिलता थी और अनुशासनहीनता सर्वत्र व्याप्त हो गई थी। राजा की शासन पर पकड़ ढीली होती जा रही थी। ऐसी परिस्थितियों में मेवाड़ के सरदारों में असंतोष व्याप्त था। वह चाहते थे कि इस दुष्ट राजा को हटाकर न्याय शील और जनप्रिय राजा की नियुक्ति की जाए। बहुत ही गोपनीय ढंग से इस राजा को सत्ता से हटाने की तैयारी आरंभ हो गई। सरदार और अधिकारी लोग नहीं चाहते थे कि मेवाड़ के यश को किसी प्रकार का धब्बा लगे और उसकी कीर्ति उनके देखते-देखते मिट्टी में मिल जाए। यही कारण था कि उन्होंने गोपनीय ढंग से निर्णय लेकर महाराणा उदय सिंह प्रथम के भाई रायमल को आमंत्रित कर मेवाड़ बुलाया। रायमल उन दिनों अपनी ससुराल ईडर में था।
ओझा जी ने लिखा है कि “राजपूताने के लोग पितृघाती को प्राचीन समय से ही हत्यारा कहते थे और उसका मुंह देखने से भी नफरत करते थे। वंशावली लेखक तो उसका नाम तक वंशावली में नहीं लिखते थे।”
ग्रंथ वीरविनोद में लिखा है कि “दुराचारी महाराणा उदयकर्ण ने राज्य के लालच से अपने धर्मशील, विवेकी, प्रजावत्सल और प्रतापी पिता को मारकर सूर्यवंशियों के कुल में अपने आप को कलंक का टीका लगाया।
जब रायमल को इस प्रकार की सूचना प्राप्त हुई कि उसे मेवाड़ के प्रजाजन और अधिकारीगण राजा बनाना चाहते हैं तो वह सहर्ष इसके लिए तैयार हो गया। जब उसने मेवाड़ में प्रवेश किया तो वहां पर भी उसके आगमन को गोपनीय रखने का पूरा प्रबंध किया गया था। उसके आगमन की गोपनीयता को भंग न होने देने की अधिकारियों ने बहुत ही अच्छी तैयारी की थी। उन्होंने अपनी योजना की भनक महाराणा उदय सिंह को नहीं लगने दी थी। यही कारण था कि जब राणा रायमल चित्तौड़ में प्रवेश कर गए तो भी उन्होंने महाराणा उदय सिंह को उनके आगमन की सूचना नहीं होने दी। उन्होंने बहुत ही बुद्धिमत्ता पूर्ण मार्ग अपनाया और वे महाराणा उदय सिंह को शिकार खिलाने के लिए जंगल में ले गए। जब महाराणा उदय सिंह महल से निकल गया तो इसी समय राणा रायमल को किले में प्रवेश दिलाया गया।
मेवाड़ के सामन्त उस समय उदयकर्ण को गद्दी पर बैठने से नहीं रोक सके, क्योंकि एक तो उदयकर्ण महाराणा कुम्भा का बड़ा बेटा था, इसलिए उत्तराधिकारी वही था। दूसरी बात ये कि उस समय उदयकर्ण के खिलाफ जाना सामन्तों के लिए भी समस्या खड़ी कर सकता था, क्योंकि उदयकर्ण के सहयोगी भी वहां मौजूद थे।
मेवाड़ के सामंत उदयकर्ण के दरबार में अपने भाई-बेटों को भेजकर औपचारिकता निभाने लगे और उदयकर्ण को राजगद्दी से हटाने के प्रयास करने लगे। उदयकर्ण ने भी उन्हें खुश करने के प्रयास किए।
उदयकर्ण ने सिरोही के राजा से संधि करके उनको आबू का क्षेत्र लौटा दिया। उसने महाराणा कुम्भा के भाई क्षेमकर्ण/खेमा से भी मेलजोल बनाए रखा। इतिहासकार रामवल्लभ सोमानी ने तो ये लिखा है कि खेमा ने ही उदयकर्ण को भड़काकर महाराणा कुम्भा की हत्या करवाई।
मृत्यु
उदयकर्ण भागकर सोजत चला गया। सोजत के कुँवर बाघा राठौड़ ने अपनी पुत्री का ब्याह उदयकर्ण से करवा दिया। फिर कुछ समय उदयकर्ण ने बसी के मंदिर में गुजारा। फिर उदयकर्ण बीकानेर गया और वहां कुछ समय तक रहा।
बीकानेर से उदयकर्ण अपने दोनों बेटों सूरजमल व सैंसमल समेत मांडू के बादशाह गयासुद्दीन खिलजी के पास चला गया। उदयकर्ण ने गयासुद्दीन से अपनी बेटी के विवाह के बदले मेवाड़ पर चढाई करने का करार किया।
एकलिंगनाथजी की कृपा से ये सम्बन्ध नहीं हुआ, क्योंकि करार करके अपने शिविर की तरफ लौटते वक्त उदयकर्ण पर बिजली गिर गई, जिससे उसकी मौत हो गई।
यदि उदयकर्ण ने सब्र से काम लिया होता, तो एक दिन राजगद्दी वैसे भी उन्हीं की होती। परन्तु अनर्थ करने के बाद मिला राज कुछ समय में ही उनके हाथों से छीन गया। मेवाड़ का इतिहास रहा है कि यहां के सामन्तों ने किसी अयोग्य शासक को अधिक समय तक राज नहीं करने दिया।
