राणा रायमल

राणा रायमल 

मेवाड़ के राणा 

मेवाड़ 

शासनावधि 1473–1509 

पूर्ववर्ती उदयसिंह प्रथम 

उत्तरवर्ती राणा सांगा 

निधन 1509 

जीवनसंगी शृंगार देवी और रतन बाई झाली 

संतान राणा सांगा 

मेवाड़ के पृथ्वीराज 

जयमल 

पिता कुंभा 

राणा रायमल (1473 -1509) मेवाड के राजपूत राजा थे। वे राणा कुम्भा के पुत्र थे। उनके शासन के आरम्भिक दिनों में ही मालवा के शासक घियास शाह ने चित्तौड़ पर आक्रमण किया किन्तु उसे सफलता नहीं मिली। इसके शीघ्र बाद घियास शाह के सेनापति जफर खान ने मेवाड़ पर आक्रमण किया किन्तु वह भी मण्डलगढ़ और खैराबाद में पराजित हुआ। रायमल ने राव जोधा की बेटी शृंगारदेवी से विवाह करके राठौरों से शत्रुता समाप्त कर दी। रायमल ने रायसिंह टोडाऔर अजमेर पर पुनः अधिकार कर लिया। उन्होने मेवाड़ को भी शक्तिशाली बनाया तथा चित्तौड़गढ़ चित्तौड़ के एकनाथ जी मंदिर का पुनर्निर्माण कराया।रायमल के अंतिम वर्षों के शासनकाल में राजकुमार संग (बाद में राणा साँगा) के साथ उनके बेटों के बीच झगड़े के कारण संघर्ष हुआ। पृथ्वीराज और जयमल दोनों पुत्र मारे गए। इस कठिन मोड़ पर राणा को सूचित किया गया था कि सांगा अभी भी जीवित था और छिपने में था। रायमल ने सांगा को चित्तौड़ वापस बुलाया और उसके तुरंत बाद उसकी मृत्यु हो गई।

रायमल का मेवाड़ आगमन : रावत कांधल चुंडावत की अध्यक्षता में सब सरदारों ने तय किया कि महाराणा कुम्भा के दूसरे पुत्र रायमल को ईडर से बुलाया जाए। रायमल ईडर से कुछ फ़ौज लेकर निकले और ब्रह्मा की खेड़, ऋषभदेव होते हुए जावर के निकट पहुंचे।

यहां मेवाड़ के कई सामंत अपनी-अपनी फ़ौजों समेत रायमल से मिल गए। जावर के पास रायमल और उदयकर्ण की सेनाओं में लड़ाई हुई, जिसमें रायमल विजयी रहे और जावर पर उनका अधिकार हो गया।

फिर रायमल एकलिंगनाथ जी के मंदिर में गए, जहां अन्य सामन्तों को भी बुलाया और यह तय किया कि अधर्मी उदयकर्ण को गद्दी से खारिज किया जावे।

रायमल सुल्तान और उसके भतीजों से लड़ते

दिल्ली के सुल्तान, सिकंदर लोदी ने मेवाड़ के राणा रायमल के खिलाफ लड़ाई लड़ी, जो सूरजमल और सहसल के साथ था, जिसमें सुल्तान की हार हुई थी। सूरजमल बच गया और राणा रायमल ने उसे माफ कर दिया। वह एक षड्यंत्रकारी था और यह सुनिश्चित करता था कि रायमल के बेटे सिंहासन के लिए अपना रास्ता स्पष्ट करने के लिए एक-दूसरे के साथ लड़े। वह एक बहादुर सेनानी था और अपने कबीले के सभी महान गुणों को समेटे हुए था।

सदरी की लदाई

सूरजमल और रायमल की सेनाएं सदरी में मिलीं, जो सूरजमल ने कब्जा कर लिया था। रायमल का पुत्र पृथ्वीराज अपने पिता के साथ युद्ध में महत्वपूर्ण समय पर शामिल हुआ और उसने सूरजमल पर सीधा हमला किया। दिन के युद्ध के बाद शाम को उनकी बातचीत एक राजपूत योद्धा के असली चरित्र का प्रतिनिधित्व करते हुए महाकाव्य थी। सूरजमल के मेवाड़ छोड़ने और प्रतापगढ़ में बसने के बाद से कई ऐसी झड़पें हुईं जहाँ उनके वंशज अभी भी फले-फूले और सिसोदिया वंश का नाम लेते रहे। पृथ्वीराज को बाद में अबू देवरा प्रमुख द्वारा जहर देकर मार दिया गया और इस तरह जयमल की मृत्यु हो जाने पर संगा की वापसी के लिए रास्ता बना।

रायमल की मेवाड़ विजय : रायमल ने दाडिमपुर युद्ध में विजय प्राप्त करने के बाद उदयकर्ण का पीछा किया। उदयकर्ण जावी के किले में जा घुसा। रायमल ने जावी पर भी अधिकार कर लिया। फिर उदयकर्ण वहां से भागा और पानगढ़ में शरण ली।

पानगढ़ का एक चौहान किलेदार उदयकर्ण का सहयोगी था। रायमल ने उदयकर्ण की फौज को परास्त कर पानगढ़ पर भी अधिकार कर लिया। उदयकर्ण वहां से भी भाग निकला।

फिर रायमल ने चित्तौड़गढ़ दुर्ग को घेर लिया और सुबह के वक्त उदयकर्ण की फ़ौज को परास्त कर किले पर अधिकार कर लिया। इन लड़ाईयों में सलूम्बर रावत कांधल चुंडावत (रावत चूंडा के पुत्र) ने रायमल का साथ दिया।

1473 ई. – रायमल की कुम्भलगढ़ विजय : उदयकर्ण जगह-जगह रायमल की फ़ौज से परास्त होकर कुंभलगढ़ की तरफ़ भाग निकला।

कुंभलगढ़ में मौजूद उदयकर्ण की तरफ वाले राजपूतों ने आपस में सलाह की कि उदयकर्ण तो हर लड़ाई में रायमल से हार रहा है, इसलिए अब हमको रायमल का ही साथ देना चाहिए।

रायमल ने जब कुम्भलगढ़ पर चढ़ाई की, तब उनके साथ वागड़, छप्पन, मारवाड़, खैराड़ और हाड़ौती की फ़ौजें भी थीं। रायमल के कुम्भलगढ़ के निकट पहुंचने पर उदयकर्ण के साथ वाले राजपूत बातों-बातों में शिकार का बहाना बनाकर उदयकर्ण को किले की तलहटी में ले गए।

रायमल को आसानी से कुंभलगढ़ जीतने का अवसर मिल गया। रायमल ने उदयकर्ण के बेटों को कुम्भलगढ़ से निकाल दिया। रायमल ने एक राजपूत को भेजकर उदयकर्ण को कहलवाया कि “तू अपना काला मुंह लेकर कहीं दूर चला जा, वरना रायमल तुझे जीवित नहीं छोड़ेगा।”

 

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